दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंधों को गैर आपराधिक कृत्य घोषित करने की माँग से संबंधित याचिका पर सुनवाई शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दी।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एपी शाह की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह जानने के बाद सुनवाई स्थगित कर दी कि जिस पीठ के पास पहले यह मामला था, उसने अभी इसे छोड़ा नहीं है।
पीठ ने कहा इस पर हमारे सुनवाई करने से पहले उस पीठ को यह मामला छोड़ना होगा, जहाँ यह पहले से ही चल रहा है।
22 मई को पिछली सुनवाई में अदालत ने इस मामले में अटार्नी जनरल की सहायता माँगी थी। याचिका में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 में संशोधन किए जाने की माँग की गई है, जिसमें समलैंगिक गतिविधियों पर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है।
यह याचिका गैर सरकारी संगठन 'नाज फाउंडेशन' ने दायर की है, जिसमें माँग की गई है कि धारा 377 को असंवैधानिक घोषित किया जाए।
याचिका में कहा गया है कि धारा 377 से किसी नागरिक के मूलभूत अधिकार का उल्लंघन होता है और इससे अवैध यौन संबंधों को बढ़ावा मिलता है।
याचिका में कहा गया है समलैंगिक संबंधों की नैतिक आधार पर आलोचना बेशक की जा सकती है, लेकिन वयस्कों की सहमति वाले समलैंगिक संबंधों को अपराध मानना गलत है।
केंद्र ने इस पर अपने जवाब में विरोधाभासी रुख अपनाया है। गृह मंत्रालय जहाँ अपराध प्रावधान को बरकरार रखने के पक्ष में है, वहीं स्वास्थ्य मंत्रालय वयस्कों की सहमति वाले समलैंगिक संबंधों के मामले में धारा 377 के कार्यान्वयन के खिलाफ है।
गृह मंत्रालय ने कहा है कि भारतीय समाज समलैंगिक संबंधों को कड़ाई से खारिज करता है। दूसरी ओर स्वास्थ्य मंत्रालय ने दंड प्रावधान का पक्ष नहीं लिया है।
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