हाथापाई और उड़ते कागजों के टुकड़ों के बीच राज्यसभा में महिलाओं को लोकसभा एवं विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का विधेयक पेश हो गया। इस दौरान संसद परिसर में महिला सदस्यों के कदमों में गजब की फुर्ती और जीत-सा उत्साह झलक रहा था।
दोपहर का तीखा सूरज सिर पर चढ़ा हुआ था। महिला सदस्यों की बिंदियों की रोली पसीने में भीग कर माथे पर अबीर और लाल की तरह फैल रही थी, लेकिन उन्हें कोई परवाह नहीं थी। आखिर वे संसद के भीतर पुरुष सत्ता से लडाई में पहली बाजी जीत चुकी थीं।
महिला सांसदों में कोई दलगत भावना नहीं दिखाई दे रही थी। सदन में विधेयक के परखच्चे उड़ाने वाले सांसदों को देश का जनमत तैयार करने वाला मीडिया हिकारत से देख रहा था और ताने भरे सवाल पूछ रहा था।
जश्न मनाने वालों में महिला कांग्रेस की अध्यक्ष प्रभा ठाकुर थीं तो भाजपा की सुषमा स्वराज भी। कद्दावर महिला नेता रेणुका चौधरी गरज-गरज कर कह रही थीं कि अब हम पीछे कदम नहीं रखने वाले। किसी में है ताकत तो हमें रोक ले। अब तो यह विधेयक पास होकर रहेगा।
राज्यसभा की पूर्व उपसभापति नजमा हेपतुल्ला विनम्रतापूर्वक, लेकिन दृढ़ता से कह रही थीं अब इस विधेयक के पारित होने का समय आ गया है। हमारे पास दोनों सदनों में बहुमत है। जब मैं हमारे पास बहुमत होने की बात कह रहीं हूँ तो इसका मतलब है विधेयक के पक्ष में बहुमत है, विरोधियों की संख्या कम रह गयी है। जो विरोधी बचे भी हैं, उनकी आवाज में दम नहीं रह गया है।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की वृंदा करात बयान देने में थक नहीं रही थीं। उन्हें इस बात की तसल्ली थी कि विधेयक पेश हो गया। एक पड़ाव पार कर लिया गया। विरोध के स्वरों को वह लोकतंत्र की प्रक्रिया मान रही थीं, लेकिन उन्हें विश्वास था कि विधेयक के पक्ष में पूरा समर्थन है।
महात्मा गांधी की शांत चित्त, मौन और विचार मग्न प्रतिमा के आसपास महिलाओं के कदमों में भरपूर चपलता थी, लेकिन पुरुष सांसदों के चेहरे पर कुछ छिनने को बोध छिप नहीं पा रहा था।
अलबत्ता भाजपा के एसएस अहलूवालिया, माकपा के सीताराम येचुरी और कांग्रेस के अनेक नेता विधेयक को सदन में पेश किए जाने का श्रेय किसी न किसी रूप में ले रहे थे। गोया कुछ ऐसा था, जिससे वे दान के सुख का अहसास कर रहे हों।
|