सत्तारूढ़ संप्रग और विपक्षी राजग के भीतर गहरे मतभेद के बावजूद सरकार ने बहुप्रतीक्षित महिला आरक्षण विधेयक को बुधवार को राज्यसभा में पेश किए जाने को मंजूरी दे दी।
लोकसभा और राज्य विधानसभा में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने वाले इस विधेयक को केंद्रीय कैबिनेट ने उस समय मंजूरी दी, जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार पाँच साल के कार्यकाल के अंतिम वर्ष में प्रवेश करने जा रही है।
संप्रग को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दल सरकार पर विधेयक को अमली जामा पहनाने की दिशा में पहल करने को लेकर दबाव डाल रहे हैं। हालाँकि इस मुद्दे पर संप्रग के भीतर गहरे मतभेद हैं। पिछले करीब 15 साल से महिला आरक्षण विधेयक को लाए जाने की कोशिश की जाती रही है, लेकिन इसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका, क्योंकि कई राजनीतिक दल, पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए आरक्षण के भीतर आरक्षण की माँग करते रहे हैं।
पिछले 12 साल में कम से कम दो बार लोकसभा में इस विधेयक को पेश किया गया। विधेयक सबसे पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने सदन में पेश किया था। उस दौरान कुछ सदस्यों ने विधेयक की प्रति छीने जाने समेत इस मुद्दे को लेकर सदन में खासा हंगामा खड़ा कर दिया था।
राजग शासन के दौरान उनके कानून मंत्री राम जेठमलानी ने लोकसभा में इस विधेयक को पेश किया था, लेकिन उसका भी वही हश्र हुआ। उनसे भी विधेयक की प्रति छीनी गई थी। रेलमंत्री और राजद प्रमुख लालूप्रसाद ने पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति से संबद्ध महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण में से आरक्षण दिए जाने की वकालत की है।
यह दीगर बात है कि प्रसाद केंद्रीय मंत्री हैं और उनकी पार्टी संप्रग की प्रमुख इकाई है। राजद के नेता विधेयक लाए जाने के पक्ष में नहीं हैं। लालूप्रसाद ने कहा कि उनकी पार्टी ने महिला आरक्षण का कभी विरोधी नहीं किया, लेकिन वह समाज के वंचित तबकों से ताल्लुक रखने वाली महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण में से आरक्षण दिए जाने के हिमायती है। समाजवादी पार्टी के महासचिव अमरसिंह ने अपने बयान में कहा कि जब महिला आरक्षण विधेयक की बात आएगी तो संप्रग के लालूप्रसाद, यूएनपीए के मुलायमसिंह यादव और राजग के शरद यादव एक ही मंच पर नजर आएँगे।
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