यदि आप दोंनों यानी पति-पत्नी नौकरी पेशा हैं तो क्या आपने सोचा है कि अपने बच्चों के साथ आप एक दिन में कितना समय बिता पाते हैं और इसका बच्चों के व्यवहार पर क्या असर पड़ रहा है?
महानगरों की मशीनी जिंदगी में सुबह घर से निकलने के बाद ट्रेफिक की रेलम पेल और भाग दौड़ के बाद करीब आठ दस घंटे कार्यालय में बीतने और फिर वापस घर की तरफ रुख करने से लेकर बिस्तर तक पहुँचने के बीच बच्चों की बात आप कितना सुन पाते हैं? उनके सवालों का कितना जबाव दे पाते हैं? खेलकूद में कितना हाथ बँटा पाते हैं, शायद बहुत कम।
उद्योगपतियों के संगठन (एसोचैम) के सामाजिक विकास न्यास ने शहरों के करीब 3000 कामकाजी अभिभावकों से इस बारे में बातचीत की और इन सवालों के जबाव जानने का प्रयास किया है।
इस नवीनतम अध्ययन में जो निष्कर्ष सामने आए हैं, उसके मुताबिक कामकाजी माता-पिता मात्र आधा घंटा ही अपने बच्चों के साथ बिता पाते हैं और उनके बच्चे घर पर अकेलेपन में समय बिताते हैं। वह बड़े होकर भी अकेलपन के शिकार रहते हैं और अल्पभाषी इनसान बनते हैं।
अध्ययन में कामकाजी माताओं ने पूरी ईमानदारी से स्वीकार भी किया है कि वे अपने बच्चों के साथ बहुत कम समय बिता पाते हैं और इस मामले में पूरे समय काम पर रहने वाली माताओं ने अपने को बच्चों की देखभाल के मामले में दस में से दो नंबर भी दिए हैं। हालाँकि पूरे समय घर पर रहने वाली माताओं ने इसका पूरा श्रेय लेते हुये अपने को पूरे 10 नंबर दिए हैं। 'बच्चों के मामले में कामकाजी अभिभावकों की दुर्दशा' नामक इस अध्ययन को एसोचैम सामाजिक विकास न्यास के अध्यक्ष वेणुगोपाल एन. धूत ने जारी किया। धूत ने कहा कि इस अध्ययन से पता चलता है कि कामकाजी लोगों के 24 घंटे काम करते हुए यात्रा में, घर के काम में, टेलीविजन देखने और सोने में ही निकल जाते हैं।
पूरे दिन कार्यालय में बिताने वाली महिलाओं के दस घंटे में दफ्तर में, ढाई से तीन घंटे सफर में, छह घंटे सोने में और तीन घंटे घर के काम में निकल जाते हैं। एक घंटा बातचीत या फिर टेलीविजन देखने में बीतता है और मुश्किल से आधा घंटा वह बच्चों के लिए निकाल पाती हैं।
पुरुषों के मामले में भी स्थिति ज्यादा अलग नहीं है। पुरुष 11 से 12 घंटे ऑफिस में, दो-ढाई घंटे आने जाने में, करीब डेढ घंटा टेलीविजन देखने में और आठ घंटे सोने में निकल जाते हैं। इसके बाद उनके पास मुश्किल से ही आधा घंटा बच्चों के साथ बिताने के लिए निकल पाता है।
ज्यादा घंटे दफ्तर में काम करने वाले अथवा अनिश्चित काम के घंटे वाले माता-पिता के मामले में तो स्थिति और भी खराब रहती है। वह न तो बच्चों के स्कूल समारोहों में शामिल हो पाते हैं और न ही सप्ताहांत परिवार के साथ बिता पाते हैं।
अध्ययन में 85 प्रतिशत कामकाजी अभिभावकों ने माता अथवा पिता में से किसी एक के कामकाजी होने वाले परिवारों की तुलना में बच्चों के मामले में अपने को नकारात्मक रेटिंग दी है।
इनमें 75 प्रतिशत कामकाजी अभिभावकों का तो यहाँ तक कहना है कि वह सप्ताह में मिलने वाली एक छुट्टी के दिन भी बच्चों के साथ ठीक से नहीं बिता पाते हैं। उनका एकमात्र रविवार का दिन भी घर का सामान खरीदने और दूसरी घरेलू जिम्मेदारियाँ निभाने में ही निकल जाता है।
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