उच्चतम न्यायालय ने बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद हुए दंगों में हत्या के सिलसिले में पाँच लोगों की दोषसिद्धि की पुष्टि में विभाजित निर्णय दिया है।
न्यायमूर्ति एसबी सिन्हा और न्यायमूर्ति एचएस बेदी के बीच विचारों के मतभेद के मद्देनजर मामले को अब वृहद पीठ को सौंपने के लिए इसे प्रधान न्यायाधीश के समक्ष रखा गया है। हालाँकि न्यायमूर्ति सिन्हा ने दोषी करार दिए गए पाँचों लोगों को बरी करने का आदेश दिया, जबकि न्यायमूर्ति बेदी ने देश की पुलिस को अल्पसंख्यक विरोधी करार देते हुए हरेन्द्र सरकार और चार अन्य लोगों को सुनाई गई उम्रकैद की सजा की पुष्टि की।
इससे पहले निचली अदालत ने बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के एक हफ्ते बाद 14 दिसंबर 1992 को असम के दाबोका जिले के चांगमाजी पाथरगाँव में साहिरा खातून और उनकी दो नन्हीं बेटियों बिमला खातून (3) और हाजिरा खातून (7) की हत्या के मामले में हरेन्द्र और चार अन्य लोगों को दोषी ठहराया था।
न्यायमूर्ति बेदी ने सांप्रदायिक दंगों की पुलिस जाँच की मौजूदा स्थिति पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि पुलिस मशीनरी अल्पसंख्यक विरोधी पूर्वाग्रह अपना रही है।
उन्होंने अपने डिसेंटिंग फैसले में कहा कि यह बहुत त्रासदीपूर्ण है कि सांप्रदायिक दंगों को रोकने या उन पर नियंत्रण करने के लिए रीम के रीम कागज इस्तेमाल किए गए और दर्जनों सुझाव दिए गए फिर भी यह कैंसर अनेक कारकों के चलते फल- फूल रहा है।
न्यायमूर्ति बेदी ने सांप्रदायिक दंगों के सिलसिले में देश भर में गठित जाँच आयोगों की रिपोर्टों के निष्कर्षों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें कमोबेश यही परिणाम निकाला जाता है कि पुलिस मशीनरी इस पर अंकुश लगाने में नाकाम रही।
उन्होंने कहा कि यह एक खतरनाक रुझान है कि स्थानीय बड़े लोगों की ओर से यह कोशिश की जाती है कि नामी गुंडों और असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई की शुरुआत नहीं हो। उन्होंने कहा हम जानते हैं कि पुलिस भी इस संबंध में आरोपों से पूरी तरह मुक्त नहीं है।
उन्होंने अपीलकर्ता सरकार और अन्य की इस दलील को खारिज कर दिया कि उन्हें इस मामले में फँसा दिया गया है, क्योंकि दोनों परिवारों के बीच भूमि विवाद था।
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