देश के दो पूर्व न्यायाधीशों ने आतंकवाद से निपटने की नीति की आलोचना करते हुए रविवार को कहा कि सरकारी एजेंसियों ने सांप्रदायिक विवादों को हल करने में अपेक्षित दायित्वों का निर्वाह नहीं किया।
ऑल इंडिया मिल्ली कॉउंसिल की ओर से यहाँ 'आतंकवाद और न्याय' विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में न्यायमूर्ति जेबी पटनायक और न्यायमूर्ति एएम अहमदी ने इस बात पर जोर दिया कि आतंकवाद की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। उन्होंने कहा कि हिंसा की हर घटना को आतंकवाद नहीं कहा जा सकता।
न्यायमूर्ति पटनायक ने कहा कि आतंकवाद के आरोप में पकड़े गए आरोपियों को कानून और इंसाफ से वंचित नहीं किया जा सकता और हर आतंकवादी का यह हक है कि उसके साथ कानून के अनुसार सुलूक किया जाए।
न्यायमूर्ति अहमदी ने मुख्य भाषण देते हुए कहा कि हमारी सरकारी एजेंसियों ने सांप्रदायिक विवादों को हल करने में अपना वह दायित्व नहीं निभाया, जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है। उन्होंने वोट बैंक की राजनीति का इसका एक कारण बताया।
आतंकवाद के कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए न्यायमूर्ति अहमदी ने कहा कि राजनीतिक विरोधाभास में विभिन्न समूह नाइंसाफी से लड़ने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। कई बार कमजोर वर्ग ऐसा तरीका अपनाता है जिसे ताकतवर आतंकवाद करार देता है और इस आधार पर कमजोर वर्ग को उसके अधिकारों से वंचित करने के लिए ताकत के इस्तेमाल का तर्क देता है। इस संदर्भ में उन्होंने स्वाधीनता संग्राम का हवाला देते हुए सवाल किया कि क्या शहीद भगतसिंह और नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आतंकवादी कहा जा सकता है।
कॅउंसिल महासचिव डॉ. मोहम्मद मंजूर आलम ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा़ कि अब समय आ गया है कि हम सवालों द्वारा अपनी समस्याओं को रखें। वे सवाल जिनके जवाब देने की जिम्मेदारी सरकार, प्रशासन और व्यवस्था की है। उन्होंने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया से भी अपनी कार्यप्रणाली की समीक्षा करने का सुझाव दिया।
संगोष्ठी को संबोधित करने वालो में सिख गुरूद्वारा प्रबन्धक कमेटी के अध्यक्ष केएस सरना, एमनेस्टी इंटरनेशनल के निदेशक मुकुल शर्मा, दलित नेता प्रेम पति, जोधपुर विश्वविद्यालय के डॉ. कुमार राजीव प्रमुख थे।
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