आर्थिक तंगी झेल रहे प्रख्यात साहित्यकार अमरकांत के मामले में हिन्दी साहित्य जगत दो फाड़ नजर आ रहा है। एक वर्ग का मानना है कि सरकार के आगे हाथ फैलाने के बजाय हिन्दी समाज को आगे आना चाहिए और मुफलिसी के वक्त साहित्यकारों की मदद करनी चाहिए। वहीं दूसरा वर्ग इस राय से इत्तफाक नहीं रखता। वह मानता है कि केवल साहित्य अकादमी और संस्कृति विभाग बना देने से सरकार की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती बल्कि बदहाली के दौर में सरकार को साहित्यकार की मदद करनी चाहिए।
वरिष्ठ साहित्यकार कृष्णा सोबती ने कहा कि आजादी के साठ साल बाद भी यदि हमारे साहित्यकार जीवन के अंतिम पड़ाव में ऐसे दौर से गुजरते हैं तो यह हमारे लिए शर्म की बात है। यह साहित्यकार की अस्मिता और इज्जत का सवाल है।
हिन्दी समाज में तालीम की कमी है। आवश्यकता है हिन्दी समाज की मनोवृत्ति बदले ताकि फिर किसी साहित्यकार को निर्मल वर्मा और अमरकांत की तरह सरकार के आगे हाथ न फैलाने पड़ें।
उन्होंने रुँधे गले से कहा कि साहित्यकारों को चाहिए कि वह साहित्य अकादमी जैसी किसी संस्था के पास जाएँ और एक कोष का गठन करें जिसमें पुरस्कार से मिलने वाली राशि का अंश और तमाम भाषाओं के साहित्यकार स्वैच्छिक अंश दान करें जिसके जरिये बुरे वक्त में लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों की मदद की जा सके।
ज्ञानपीठ के कार्यकारी निदेशक रविन्द्र कालिया ने कहा कि ज्ञानपीठ ने इस संबंध में कदम आगे बढ़ दिए हैं और जल्द ही उनकी सहायता की जाएगी।
उन्होंने कहा कि संगठनों का यह फर्ज बनता है कि खराब दौर में वे प्रतिष्ठित साहित्यकार की मदद करें। हालाँकि साहित्यकारों को प्रकाशकों का चुनाव काफी सावधानी से करना चाहिए ताकि अंतिम दौर में इन हालातों से न गुजरना पड़े। कालिया ने कहा कि दुर्भाग्य हमारी व्यवस्था का है कि साहित्यकारों को ऐसे दिन देखने पड़ते हैं। शासन का फर्ज है कि संस्कृति विभाग की फैलोशिप अमरकांत को तुरंत बुलाकर देनी चाहिए। सरकार एक समिति बनाए जिसमें आवेदन न करना पड़े बल्कि जरूरतमंद साहित्यकारों को पेंशन के लिए चुना जाए।
वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र यादव का कहना है कि अमरकांत को पेंशन जरूर दी जानी चाहिए। मगर उन्हें एक मुश्त रकम नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि उसके दुरुपयोग का खतरा होगा। उन्होंने कहा कि सरकार को जरूरतमंद साहित्यकारों की मदद के लिए पेंशन की शुरुआत करनी चाहिए क्योंकि साहित्यकार देश की अनमोल धरोहर हैं।
कवि अशोक चक्रधर ने कहा कि अमरकांत के मामले पर साहित्यकारों को परिचर्चा आयोजित करनी चाहिए और उसमें होने वाले ठोस निर्णयों से सरकार को अवगत कराएँ और सरकार पर दबाव डालें कि वह बुरे दौर में साहित्यकारों की मदद करे।
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