यदि आपने सत्यजीत राय की फिल्में नहीं देखी हैं तो इसका मतलब आप दुनिया में बिना सूरज या चाँद देखे रह रहे है।
महान जापानी फिल्मकार अकीरा कुरासोवा के ये वाक्य उस व्यक्ति को संपूर्ण रूप से परिभाषित करने के लिए काफी हैं, जिन्हें भारतीय सिनेमा के चेहरे को हमेशा-हमेशा के लिए बदल कर रख देने वाला माना जाता है।
रे ने बंगाली में अपनी फिल्में बनाईं इसके बावजूद उनकी वैश्विक पहुँच है। विषयों से निपटने में उनकी मानवतावादी सोच तथा चरित्रों को बखूबी संभालने की कला ने उन्हें दुनिया के महान और अद्भुत प्रतिभाशाली फिल्मकारों में जगह दिलाई।
1992 में उनकी मौत के 16 साल बाद आज भी वह अपने सृजनात्मक दृष्टिकोण से नई पीढ़ियों को प्रेरित कर रहे हैं। आज सत्यजीत रे को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी जा रही है।
दस बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले फिल्म निदेशक जाह्नू बरूआ कहते हैं भारत में वह पहले फिल्म निर्माता थे, जिन्होंने विश्व सिनेमा की अवधारणा का अनुसरण किया। भारतीय सिनेमा में आधुनिकतावाद लाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। उनकी फिल्में हमेशा यथार्थवाद का केन्द्र रही हैं और उनके चरित्रों को हमेशा आम आदमी के साथ जोड़ा जा सकता है।
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