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कश्मीर को मुख्‍य मुद्‍दा न बनाएँ-आडवाणी
कहा- वाणिज्यिक मुद्‍दों को अहमियत दें
भाषा
वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा है कि पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों में कश्मीर समस्या को मुख्य मुद्दा बनाने पर जोर देने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। उन्होंने वाणिज्य जैसे अन्य मुद्‍दों को तवज्जो देने की वकालत की।

संसद में विपक्ष के नेता आडवाणी ने पाकिस्तानी समाचार चैनल डॉन न्यूज को दिए साक्षात्कार में कहा कि हालाँकि वे भारत और पाकिस्तान के बीच समग्र वार्ता प्रक्रिया को बढ़ावा देते हैं, लेकिन उनका मानना है कि सूचना और वाणिज्य जैसे अन्य मुद्दों को कश्मीर से अधिक तवज्जो दी जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि कश्मीर समस्या के समाधान में हालाँकि अभी समय लगेगा, लेकिन उन्होंने उम्मीद जताई की एक दिन जरूर आएगा जब भारत और पाकिस्तान इस मुद्दे के समाधान के लिए परिसंघ बनाएँगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच शांति प्रक्रिया में सीमा पार आतंकवाद गंभीर मुद्दा है।

हाल के दिनों में सीमा पर आतंकवाद की घटनाओं में कमी आने की बात स्वीकार करते हुए आडवाणी ने कहा भारत में अभी भी ऐसी घटनाएँ जारी हैं। उन्होंने कहा कि जब तक आतंकवाद की समस्या से नहीं निपटा जाता है शांति प्रक्रिया में कोई प्रगति नहीं हो सकती है।

साक्षत्कार के दौरान आडवाणी ने विविध मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए जिसमें सांप्रदायिकता भारत और पाकिस्तान के बीच शांति की संभावना और 2001 के आगरा शिखर सम्मेलन जैसे विषय शामिल थे।

आडवाणी ने कहा कि राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने आगरा शिखर सम्मेलन की विफलता के लिए उन्हें गलत तरीके से दोषी ठहराया था। उन्होंने कहा कि वास्तव में वह आगरा शिखर सम्मेलन के शिल्पकारों में से एक थे। उन्होंने कहा कि बैठक वास्तव में मुशर्रफ के गैरलचीले रुख के कारण असफल हो गई।

उन्होंने कहा कि मुशर्रफ तो यह भी स्वीकार नहीं करेंगे की जम्मू-कश्मीर या पंजाब में आतंकवाद जैसी कोई चीज भी है, जो उसके या उनके देश से प्रेरित है। आडवाणी ने कहा कि मुशर्रफ के शब्दों में तो जम्मू-कश्मीर या देश के अन्य हिस्से में जो कुछ हो रहा है, उसे आतंकवाद नहीं कहा जा सकता है।

जब आडवाणी से पूछा गया कि वर्ष 1999 में करगिल समस्या के समाधान के लिए प्रारंभ में ही कूटनीति का उपयोग क्यों नहीं किया गया तो उन्होंने कहा कि इस मुद्दे का समाधान कूटनीति से नहीं बल्कि अमेरिकी हस्तक्षेप से हुआ।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह एक तरह का युद्ध था, जिसमें पाकिस्तान ने अपने लोगों के शवों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अमेरिका के समक्ष झुका था भारत नहीं।

आडवाणी ने भाजपा की सांप्रदायिक छवि और राष्ट्रवाद में उनकी भूमिका के बारे में विस्तार से बातचीत की। उन्होंने कहा कि धर्म का लोकतंत्र में अहम स्थान है क्योंकि यह जीवन का अहम हिस्सा होता है। उन्होंने लागातार उन आरोपों से इनकार किया कि वे सांप्रदायिक कार्ड खेलते हैं।

गुजरात में 2002 के दंगों के बाद वहाँ के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का पक्ष लेने से संबंधित एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिख समुदाय पर हमलों का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा यह कोई दंगा नहीं था। एक भी हिन्दू नहीं मारा गया था, जबकि लगभग 3500 सिख मारे गए थे। कांग्रेस ने इस पर कहा था कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है। आडवाणी ने कहा कि तब मैं कैसे गुजरात सरकार में गलती ढूँढ सकता हूँ।

उन्होंने कहा कि जिन्ना मूल रूप से धर्मनिरपेक्ष नेता थे और अगर 11 अगस्त 1947 के उनके भाषण को अमल में लाया गया होता तो आज पाकिस्तान भी एक धर्मनिरपेक्ष देश होता।
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