मुख्य पृष्ठ > खबर-संसार > समाचार > राष्ट्रीय
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
अपनों की गद्दारी से पकड़े गए थे तात्या टोपे
तात्या टोपे ने बेतवा कुंच और कल्पी होकर कूच किया। ग्वालियर पहुँचकर वहाँ के अपने साथियों के समर्थन से उन्होंने नाना साहिब को पेशवा घोषित कर दिया। इससे पहले कि तात्या टोपे इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करते, हेनरी रोज द्वारा छलकपट के साथ किए गए हमले में उनकी हार हो गई, लेकिन े अंग्रेजों के हाथ नहीं आए।

इस लड़ाई में ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई भी वीरगति को प्राप्त हो गईं। रानी लक्ष्मीबाई की शहादत और ग्वालियर के अंग्रेजों के हाथों में चले जाने के बाद तात्या टोपे ने सूझबूझ के साथ गुरिल्ला युद्ध की शुरुआत कर दी।

उन्होंने सागर नर्मदा क्षेत्रों खंडेश तथा राजस्थान में गुरिल्ला युद्ध से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। मालती मलिक के अनुसार गुरिल्ला युद्ध में तात्या टोपे की सफलता लगातार जारी थी, लेकिन तभी उनके खास मित्र मानसिंह (नारवाड़ प्रमुख) ने उनके साथ गद्दारी कर दी।

मानसिंह की सूचना पर अंग्रेज जनरल रिचर्ड जॉन मीड की सैनिक टुकड़ियों ने सात अप्रैल 1859 को चुपके से हमला कर पारन के जंगल स्थित शिविर में सोए हुए तात्या टोपे को पकड़ लिया।

शिवपुरी की सैन्य अदालत में अंग्रेजों ने उन पर मुकदमा चलाया और माफी माँगने को कहा। तात्या टोपे ने सैन्य अदालत में माफी माँगने से इनकार कर दिया और कहा कि मैंने जो कुछ भी किया है वह अपनी मातृभमि की रक्षा के लिए किया है।

मुझे अंग्रेजों के खिलाफ छेड़ी गई अपनी लड़ाई पर कोई पश्चाताप नहीं है। टोपे के इस बयान पर अंग्रेजों ने शिवपुरी में 18 अप्रैल 1859 को उन्हें फाँसी दे दी। वे हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गए। मध्यप्रदेश के शिवपुरी में कलेक्टोरेट के नजदीक लगी तात्या टोपे की प्रतिमा आज भी उनकी बहादुरी तथा हौसले की कहानी कहती नजर आती है।
<< 1 | 2 
और भी
आईआईटी स्नातकों की देश को प्राथमिकता
भूटान से रेल संपर्क के लिए सर्वेक्षण
हंस सहित कई पत्रिकाओं को मदद
स्वप्न सुंदरी को बाघों के अवैध शिकार पर चिंता
महावीर जयंती पर देशवासियों को बधाई
किराया मामले में मुम्बई दूसरे स्थान पर