बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के दौरान कई अन्य अरब देशों के विपरीत भारत के साथ अच्छे रिश्तों के हिमायती तत्कालीन इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने उस घटना को ज्यादा तवज्जो नहीं दी और अपने वहाँ भारत के राजदूत को विदेश कार्यालय में बुलाकर हल्की-सी भर्त्सना की।
बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के वर्ष 1992 से 1994 तक इराक में भारत के राजदूत रहे रणजीत सिंह काल्हा ने अपनी पुस्तक द अल्टीमेट प्राइज में यह बात कही है।
काल्हा ने इसमें लिखा है कि हम मान रहे थे कि हमारे खिलाफ बडे़ पैमाने पर प्रदर्शन होंगे जैसे कि खाड़ी भर में हुए थे। हम तैयारी कर रहे थे। हम यह भी सोच रहे थे कि कुछ हिंसक घटनाएँ भी हो सकती हैं। हमने सभी भारतीयों को सावधान रहने का परामर्श भी जारी कर दिया था।
इराक की घटनाओं तथा वहाँ की तेल संपदा पर नियंत्रण की पश्चिम की चाह का उल्लेख करने वाली पुस्तक में उन्होंने कहा लेकिन हम हैरान हुए कि कुछ भी नहीं घटा। कोई प्रदर्शन नहीं हुआ। लगा कि कुछ भी नहीं घटा है।
उन्होंने कहा कि आखिरकार 12 दिसम्बर को घटना (बाबरी मस्जिद विध्वंस) के अच्छे छह दिन व्यतीत होने के बाद मुझे विदेश कार्यालय में बुलाया गया। एक बहुत कनिष्ठ स्तर के इराकी राजनयिक के साथ मुलाकात के लिए जो बैठक के दौरान बेहद नरम रहे। यह संकेत दिया गया कि ऐसा काफी शीर्ष से मिले निर्देशों की वजह से संभव हुआ। शीर्ष से आशय सद्दाम से था।
पुस्तक में काल्हा ने बताया है कि सद्दाम भारत के लिए हमेशा अच्छे रहे। बाद में 14 दिसम्बर को इराक ने एक हल्का सा बयान जारी किया जिसमें मस्जिद ढहाए जाने की आलोचना की गई तथा अनुरोध किया गया कि उसे फिर से बनाई जाए।
भारत के साथ सद्दाम तथा इराकियों की सद्भावना की प्रशंसा करते हुए उन्होंने लिखा है इसके बाद इस विषय पर हमने कुछ और नहीं सुना। उन्होंने कहा कि भारत के लिए यह भावना उसकी प्राचीन सभ्यता तथा उभरती आर्थिक ताकत को लेकर थी।
काल्हा ने जिक्र किया है कि जब ब्रिटेन ने 1917 में बगदाद पर कब्जा किया तो भारतीय रूपया इराक की अधिकृत मुद्रा बनी। बाद में 1932 में दीनार ने उसकी जगह ली। तीस के दशक के मध्य तक भारतीय डाक प्रणाली इराक में चलती रही।
द्विपक्षीय रिश्तों को प्रगाढ़ करने में 1974 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की भारत यात्रा और बाद में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की इराक यात्रा ने महती भूमिका निभाई।
उन्होंने बताया है कि भारत में शिक्षित कई वरिष्ठ इराकी अधिकारी खुलकर इंदिरा गाँधी की सराहना करते थे। वे उनकी राजनीतिक पटुता, साहस और खासकर बांग्लादेश संकट को लेकर पश्चिम से निपटने की उनकी कठोरता के कायल थे। कुछ लोग चुपचाप यह तक कहते थे कि काश उनकी तरह का कोई इराक में होता।
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