प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं में यौन शिक्षा शुरू करने के सरकार के फैसले को इस्लाम ही नहीं हिन्दू धर्म के नैतिक मूल्यों के भी विरुद्ध बताते हुए देश की प्रमुख इस्लामी संस्थाओं और मदरसों ने इस पर तुरंत रोक लगाने की माँग की है।
भारतीय इस्लामी फिकह अकादमी के नेतृत्व में देवबंद के दारूल उलूम, लखनऊ के फिरंगी महल नदवातुल उलूम और जमाते इस्लामी हिंद जैसी देश के प्रमुख इस्लामी संस्थाओं और सैकड़ों मदरसों के उलेमाओं ने हाल ही में हुई अपनी 17वीं गोष्ठी में किए गए फैसले में नाबालिग लड़के-लड़कियों को यौन शिक्षा देने के सरकार के फैसले पर खेद प्रकट किया है।
उन्होंने कहा है कि वह भारत के नैतिक मूल्यों की परंपराओं को ताक पर रखकर पश्चिमी देशों के उस एजेंडे पर चल रही है, जो उन्मुक्त यौन संबंधों को बढ़ावा देता है। अकादमी के मुख्य मुफ्ती अहमद नादिर अल काजिम ने कहा कि इस्लाम यौन शिक्षा के खिलाफ नहीं है, इस्लामी मदरसों में खुद यह शिक्षा दी जाती है, लेकिन सिर्फ बालिग बच्चों को।
उन्होंने बताया कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों के बालिग होने के बाद उन्हें पाकी, नापाकी और शौहर-बीवी के रिश्तों की तालीम के तहत सेक्स में एहतियात बरतने वाली सभी बातें बताई जाती हैं। मुख्य मुफ्ती ने कहा कि प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के बच्चे-बच्चियों के बजाय 14 साल की उम्र पार कर चुके छात्रों को यौन शिक्षा देने पर उलेमाओं को कोई एतराज नहीं है।
अकादमी के सचिव अमीन उस्मानी ने कहा कि प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के बच्चों के बजाय यौन शिक्षा उस स्तर पर शुरू की जा सकती है, जब बच्चों को जीव- विज्ञान की शिक्षा देना प्रारंभ किया जाता है।
उन्होंने कहा कि सरकार ने एड्स जैसी बीमारियों को काबू करने की नेकनीयती के तहत यौन शिक्षा देने का फैसला किया है, लेकिन यह प्रयोग व्यवहार में उन्मुक्त यौन को मान्यता देना होगा। उन्होंने यह आशंका भी प्रकट की कि कच्ची उम्र के बच्चों को ऐसी शिक्षा देने वाले अध्यापक भी उसका गलत इस्तेमाल कर सकते हैं।
गोष्ठी में किए गए निर्णय में कहा गया है हुकूमते हिंद तालीमगाहों में जिन्सी (यौन) तालीम देने के जो मंसूबे बना रही है, सेमिनार उसे चिंता की नजर से देखता है। सेमिनार का मानना है कि प्राइमरी और मिडिल स्कूल के लड़के-लड़कियों को सेक्स और प्रजनन अंगों के बारे में बताना दरअसल वह पश्चिमी एजेंडा है, जिसे हुकूमते हिंद ने कुबूल किया है।
फैसले में कहा गया है कि इस स्तर पर यौन शिक्षा देना न सिर्फ इस्लामी शिक्षा के खिलाफ है, बल्कि खुद हिन्दू मुलकी रिवायात और परंपराओं के भी खिलाफ है। हुकूमत को ऐसी बातों पर मुक्कमल तौर पर बाज आना चाहिए वरना इसके नैतिक असर निहायत घातक होंगे।
मुस्लिम उलेमाओं ने अपने फैसले में कहा है दरहकीकत जरूरत ऐसी नैतिक तालीम और तरबियत देने की है जो नौजवानों को गैरकानूनी रिश्तों और सेक्स से बचाए न कि उन्हें उसकी ओर धकेले।
इसमें कहा गया है एड्स और उस जैसी बीमारियों से बचाने का सही तरीका नैतिक शिक्षा देकर औरतों और मर्दों को गैरकानूनी ताल्लुकात से बचाना है न कि गैरकानूनी ताल्लुकात को महफूज तरीके से अंजाम देने के गुर सिखाना। ये तो गुनाह और बुराई को दावत देना है।
सरकार से कहा गया है कि वह स्कूलों में यौन शिक्षा के अपने मंसूबे को फौरन वापस ले और इसके बदले सभी धर्मो की नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करे।
गोष्ठी में पारित निर्णय में कहा गया है हुकूमते हिंद नैतिक शिक्षा का ऐसा पाठ्यक्रम तैयार करे जो तमाम धर्मों के साझा नैतिक मूल्यों पर आधारित हो और इसमें किसी एक मजहब की छाप महसूस नहीं हो।
उस्मानी ने कहा है कि पश्चिमी देशों की यौन अवधारणाओं को बढ़ावा देने के बजाय इस्लाम और हिन्दू सहित देश के अन्य धर्मों की नैतिक तालीमात यौन कदाचार और उससे होने वाली यौन बीमारियों को नियंत्रित करने में ज्यादा ताकतवर भूमिका अदा कर सकती है।
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