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ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण
उच्चतम न्यायालय ने केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने संबंधी सरकार की अधिसूचना की संवैधानिक वैधता प्रदान करते हुए 93वें संविधान संशोधन को गुरुवार को जायज ठहराया।

इससे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसे शीर्ष केन्द्रीय संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को प्रवेश में आरक्षण का रास्ता साफ हो गया है।

मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिलाने वाले 2006 के केन्द्रीय शिक्षण संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) कानून को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पिछले साल चली लम्बी बहस के बाद उक्त कानून को वैध ठहराया।

पीठ ने साथ ही यह भी कहा कि ओबीसी की क्रीमीलेयर को इससे बाहर रखा जाना चाहिए। क्रीमीलेयर का आधार केन्द्र सरकार की इस बारे में आठ सितम्बर 1993 को जारी अधिसूचना को बनाया गया है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि क्रीमीलेयर को आरक्षण के प्रावधान से बाहर रखने की व्यवस्था अनुसूचित जाति एवं जनजाति आरक्षण में लागू नहीं होगी।

पीठ ने कहा कि यह आरक्षण नीति अनिश्चितकाल के लिए लागू नहीं रह सकती, इसलिए इसकी समय-समय पर समीक्षा की सिफारिश की जाती है। इस संविधान संशोधन में केन्द्र सरकार ने समाज के सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग को आरक्षण के माध्यम से सामान्य वर्ग के बराबर लाने का प्रावधान किया है।

पीठ ने यह भी कहा कि यदि आरक्षण का आधार जाति है तो इन जातियों की क्रीमीलेयर को आरक्षण नीति के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए।

संविधान पीठ ने चार-एक के बहुमत से उक्त कानून को वैध ठहराया। न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी की राय भिन्न थी। पीठ के अन्य सदस्यों के नाम इस प्रकार हैं- न्यायमूर्ति अरिजित पसायत, न्यायमूर्ति सीके ठक्कर और न्यायमूर्ति आरवी रवीन्द्रन।

न्यायमूर्ति सीके ठक्कर ने अपने फैसले में केन्द्र सरकार को देश की कुल जनसंख्या में अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी के बारे में और सटीक आँकड़े जुटाने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति अरिजित पसायत और न्यायमूर्ति सीके ठक्कर ने हर पाँच वर्ष के बाद आरक्षण नीति की समीक्षा की सिफारिश की, जिससे कि क्रीमीलेयर को आरक्षण से बाहर रखने के सिद्धांत पर उचित तरीके से अमल किया जा सके। मुख्य न्यायाधीश ने हालाँकि आरक्षण नीति की हर दस वर्ष के बाद समीक्षा की सिफारिश की।

न्यायमूर्ति आरवी रवीन्द्रन ने अपने अलग फैसले में लिखा है कि 93वाँ संविधान संशोधन मान्य है और यदि आरक्षण की नीति पूरी तरह से जाति पर आधारित है तो यह असंवैधानिक होगा अर्थात अन्य सामाजिक सेक्टरों को भी आरक्षण नीति का आधार बनाया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी ने अपने अलग फैसले में लिखा है कि जाति के आधार पर आरक्षण तर्कसंगत नहीं है और जब तक जाति आधारित आरक्षण की व्यवस्था जारी है, जातिविहीन समाज की स्थापना नहीं की जा सकती। उन्होंने फैसले में यह भी लिखा है कि पूर्व और मौजूदा सांसदों तथा विधायकों के बच्चों को आरक्षण नीति के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति भंडारी ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21-ए के अनुसार 6 से 14 वर्ष की उम्र के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा दिए जाने पर बहुत जोर दिया है।

उन्होंने अपने बच्चों को काम पर भेजने वाले अभिभावकों और उन्हें काम देने वाले नियोक्ताओं के खिलाफ मुकदमे की सिफारिश के साथ-साथ सरकार को यह निर्देश भी दिया है कि वह गरीबों को वित्तीय सहायता दे, जिससे कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेज सकें।

उच्चतम न्यायालय ने साफ किया है कि आरक्षण की यह नीति अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों में लागू नहीं की जा सकती, क्योंकि वे अलग श्रेणी में आते हैं और इस अधिनियम के दायरे में नहीं आते।

न्यायालय ने हालाँकि गैर सहायता प्राप्त संस्थानों में आरक्षण नीति लागू करने का विकल्प खुला छोड़ दिया है, क्योंकि इनमें से किसी ने भी सरकार की अधिसूचना के खिलाफ याचिका दायर नहीं की है।

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