कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे..... खिलते हैं गुल यहाँ...... ओ नीरज नैना सुन जरा.... जैसे कई कालजयी फिल्मी गीतों के सृजक और हिन्दी साहित्य में रूमानी गीतों की परंपरा के प्रख्यात गीतकार गोपालदास 'नीरज' का मानना है कि वर्तमान समाज सपनों के पतनशील युग में गुजर-बसर कर रहा है। इसका ही असर है कि फिल्मों में मैलोडी और गीत की जगह धूम-धड़ाका लेता जा रहा है।
विख्यात गीतकार नीरज ने बताया कि फिल्मी संगीत से मैलोडी गायब हो गई है। समय के साथ संगीत में शोरगुल और धूम-धड़ाके ने मैलोडी की जगह ले ली है और संगीत में मैलोडी देने वाले बाहर हो गए हैं। जब संगीत से मैलोडी गायब हुई तो ऐसे गीतकारों की फेहरिस्त भी परिदृश्य से गायब हो गई, जो संगीत के माधुर्य पर ही गीत की रचना करते थे।
नीरज ने अपने दौर को याद करते हुए कहा कि इंदीवर, साहिर सहित हमारे जमाने के सारे गीतकार मूलरूप से शायर और गीतकार थे, इसीलिए उन लोगों में गीत की बेहतर समझ थी। इसके अलावा 'प्रिंस ऑफ त्रिपुरा' सचिन देव बर्मन जैसे संगीतकार थे, जो खुद साहित्य की अच्छी समझ रखते थे और गानों में संस्कृतनिष्ठ शब्दों के प्रयोग को तवज्जो देते थे। वर्तमान में तो रुपया ही सबका लक्ष्य बन गया है।
नीरज ने कहा कि आजकल लिखे जा रहे फिल्मी गानों को गीत न कहकर व्यंग्य कहें तो बेहतर होगा। अंग्रेजी की नकल के चलते शास्त्रीय संगीत की समझ तो संगीतकारों में खत्म होती जा रही है। पुराने गीतों की फिल्मों और एलबम में वापसी के बारे में उन्होंने कहा कि जनता कुछ अच्छा भी सुनना चाहती है। रीमिक्स इस बात की ओर इशारा करता है कि लोगों के जेहन से आज भी पुराने गीत उतरे नहीं हैं।
'प्रेम पुजारी', 'शर्मिली', 'तेरे मेरे सपने' और 'कन्यादान' जैसी फिल्मों के लिए गाने लिखने वाले नीरज ने कहा राजनीति, ज्ञान, विज्ञान, कला और साहित्य सभी पतन की ओर जा रहे हैं। समाज सपनों का महल बनाता है और वर्तमान आदमी पतनशील युग में गुजर-बसर कर रहा।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति संवेदनशील होता जा रहा है और आज तो आदमी आदमी को मारने में भी संकोच नहीं करता। ऐसे में संगीत और गीत में जो बदलाव आए हैं वे वर्तमान समाज की मनोदशा को दर्शाते हैं। नीरज ने अपनी वापसी के बारे में कहा मुंबई की दौड़धूप मेरे लिए दूभर हो गई है। अब तो लोग आकर घर से ही लिखवा लेते हैं।
उन्होंने मुंबई की फिल्मी दुनिया की स्थिति के बारे में बताया कि वहाँ पहली कतार वाले तो खुश रहते हैं, जबकि पीछे वालों को सुबह से शाम तक दौड़ना पड़ता है। मायानगरी में रोज 300 प्रपोजल बनते हैं और हकीकत में तब्दील होते हैं बमुश्किल दो या तीन।
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