स्वास्थ्य बीमा को जुए समान बताते हुए देश की प्रमुख मुस्लिम संस्थाओं ने एक संयुक्त फैसले में इसे मुसलमानों के लिए हराम घोषित किया है।
शरिया की रोशनी में मुसलमानों से जुड़ी समस्याओं पर निर्णय देने के लिए बनाई गई भारतीय इस्लामी फिकह अकादमी ने अपने चौहदवें सम्मेलन में इस विषय पर गौर किया कि स्वास्थ्य बीमा मुस्लिमों के लिए जायज है या नहीं।
इस विषय पर लगभग तीन दिन की चर्चा के बाद अंतिम फैसले में कहा गया कि इस्लामी कानून में किसी तरह के जुए की इजाजत नहीं है। स्वास्थ्य बीमे के वर्तमान स्वरूप का जमीनी हकीकत पर विश्लेषण करने पर पाया गया कि वास्तव में यह जुए की ही एक शक्ल है।
फैसले में कहा गया कि स्वास्थ्य बीमे ने स्वास्थ्य उपचार जैसी नेक सेवा को व्यापार और धंधे में बदल दिया है। इसे देखते हुए सामान्य हालात में मुसलमानों को स्वास्थ्य बीमा कराने की अनुमति नहीं है।
अकादमी के जिस सम्मेलन में यह फैसला किया गया उसमें दारूल उलूम देवबंद, जमाते इस्लामी, जमियत उलेमा-ए-हिंद के उलेमाओं के अलावा देश भर के लगभग 300 प्रमुख मदरसों के प्रतिनिधि शामिल थे।
फैसले में कहा गया अन्य बीमों की तरह स्वास्थ्य बीमा भी उन गैर मुनासिब सौदों की तरह है जिसकी इस्लाम में अनुमति नहीं है। इसलिए सामान्य स्थिति में स्वास्थ्य बीमा की अनुमति नहीं दी जा सकती है। इस फैसले में सरकार या निजी कंपनियों द्वारा चलाई जा रही स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में भी फर्क नहीं किया जाएगा।
अकादमी ने कहा कि अगर किसी कानूनी बाध्यता के अंतर्गत स्वास्थ्य बीमा कराया गया है, तो उसकी अनुमति प्रदान किए जाने पर गौर किया जा सकता है, लेकिन ऐसी परिस्थतियों में भी सक्षम मरीज पर यह वाजिब होगा कि वह अपने इलाज में उसके द्वारा बीमा कंपनी को दिए गए धन से अधिक खर्च होने पर उस अतिरिक्त रकम को किसी परोपकार के काम में लगाए तथा इसके बदले खुदा से किसी इनाम की उम्मीद नहीं रखे।
प्रचलित सरकारी और निजी कंपनियों की स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का विकल्प सुझाते हुए उलेमाओं ने सुझाव दिया कि मुस्लिम स्वयं ऐसी स्वास्थ्य सेवाएँ और संस्थान शुरू करें जिसमें गरीब लोगों का उपचार हो सके और उनकी जरूरतों के अनुसार मदद की जा सके।
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