राजधानी दिल्ली में बंदरों के उत्पात से लोगों को निजात दिलाने के लिए 2007-08 के दौरान चलाए गए अभियान में 5520 बंदरों को पकड़ा गया।
दिल्ली सरकार के आँकड़ों के मुताबिक अप्रैल 07 से मार्च 08 तक कुल 5520 बंदरों को पकड़ा गया। दिल्ली नगर निगम ने इनमें से 4700 और नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) ने 820 बंदरों को पकड़ा।
गौरतलब है कि पिछले साल बंदरों को भगाने के प्रयास में दिल्ली के उपमहापौर सविन्द्र जीतसिंह बाजवा अपने मकान की छत से नीचे गिर पड़े थे और बाद में उनकी मृत्यु हो गई थी।
आँकड़ों के मुताबिक वर्ष 2004 में बंदरों के काटने के 536 मामले सामने आए और अगले वर्ष यह संख्या 715 पर पहुँच गई। वर्ष 2006 में इसमें और इजाफा हुआ और 783 मामले प्रकाश में आए। इसके बावजूद दिल्ली सरकार का कहना है कि बंदरों के काटने से आंतक जैसी कोई स्थिति नहीं है। ऐसी इक्का- दुक्का घटनाएँ होती रहती हैं।
बहरहाल सरकार का कहना है कि बंदरों की समस्या से निपटने के लिए पूरे प्रयास किए जा रहे हैं। पिछले वर्ष निगम ने दो बार राष्ट्रीय स्तर पर अखबारों के माध्यम से बंदरों की समस्या से निपटने के लिए मुहरबंद निविदाएँ मंगाई थीं, लेकिन इस कार्य के लिए कोई आगे नहीं आया।
इसके बाद निगम ने विभिन्न राज्यों से संपर्क कर बंदर पकड़ने वालों को बुलवाया और इन्हें 450 रुपए प्रति बंदर के हिसाब से अदा किए जा रहे हैं। फिलहाल निगम के पास बंदर पकड़ने के लिए नौ टीमें हैं।
एनडीएमसी ने अपने क्षेत्र को बंदरों से मुक्त कराने के लिए अपने कर्मचारियों के अलावा यह काम ठेके पर दिया हुआ है जिसमें दो ठेकेदार और 14 कर्मचारी लगे हुए हैं।
सरकार के मुताबिक पकड़े गए बंदरों को असोला भाटी माइंस में वन विभाग की देखरेख में रखा जा रहा है और यहाँ से बंदर भाग न सकें इसके लिए इसके चारों तरफ की दीवार को ऊँचा उठाया गया है। इसके अलावा बंदरों को सार्वजनिक स्थलों पर खाना नहीं खिलाने के लिए समाचार-पत्रों में विज्ञापन भी दिए जा रहे हैं।
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