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भावना का मैं भिखारी...
मधुशाला के रचयिता और हालावाद के प्रवर्तक डॉ. हरिवंशराय बच्चन की जन्मशती के मौके पर सोमवार को हिन्दी भवन में आयोजित कवि सम्मेलन में एकत्र कवियों ने बच्चन से जुड़े अपने संस्मरण श्रोताओं से बाँटे और उन कविताओं का पाठ किया, जिनका कभी वे बच्चन के साथ पाठ कर चुके थे।

राजधानी में कल रात आयोजित कवि सम्मेलन में विशिष्ट अतिथि के रूप में मुंबई से आई डॉ. पुष्पा भारती ने बच्चन को जीवन को भरपूर जीने वाला व्यक्ति बताते हुए कहा कि बच्चन से उनका नाता 1935 से रहा है। वे अद्वितीय व्यक्ति थे और ऊँचे संस्कारों ने उन्हें अद्वितीय बनाया।

उन्होंने सामाजिक बंधनों और वर्जनाओं को दूर किया और सुख-दुख सहना बच्चन से ही सीखा। लिखने के तो वे दीवाने थे। साहित्य को वह अपना वांग्मय कहा करते थे और कहते थे कि मेरे न रहने पर मेरे साहित्य में अगर आप मुझे और अपने आप को पा सके तो मेरा लेखन धन्य हो जाएगा और आज लगता है कि वे अपने साहित्य के रूप में हमारे बीच कहीं हैं।

उन्होंने कहा कि लोग उन्हें सामाजिक सरोकारों का कवि नहीं मानते लेकिन उन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर भी कुठाराघात करते हुए भी काव्य रचना की है। इस मौके पर पुष्पा भारती ने अमिताभ बच्चन का पत्र पढ़कर सुनाया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रामनिवास जाजू ने बताया कि पिलानी में उन्होंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन का कार्यक्रम आयोजित किया और बच्चन को आमंत्रित किया था। चित को चमत्कृत करने वाले कवि बच्चन से उनका यही पहला साक्षात्कार था।

जाजू ने बताया 1949 में लोहारू रेलवे स्टेशन पर ठिठुरन भरी रात में मैं उन्हें लोहारू से पिलानी ले गया। बच्चन ने 'भावना का मैं भिखारी, ढूँढता फिरता अकेला' कविता का पाठ किया था। बच्चन शब्दों के धनी व्यक्ति थे और मंचीय गेय कविता को सम्मान देने का नाम ही बच्चन था।

कवि बाल स्वरूप राही ने कहा बच्चन इतने बड़े कवि थे लेकिन एक बार उन्होंने मेरी एक कविता की प्रशंसा करते हुए कहा था कि राही मुझसे भी आगे निकल गए हैं। एक नवोदित कवि के लिए यह बड़ी बात थी। बच्चन के शिष्य डॉ. अजीत कुमार ने उनका स्मरण करते हुए बताया कि बतौर अध्यापक और कवि वह एकदम अलग-अलग रहते थे।

प्रख्यात गीतकार गोपालदास नीरज ने बताया कि बच्चन के साथ उनके संबंध 1944 से रहे। कई मंचों पर दोनों ने एक साथ काव्यपाठ भी किया। उनकी पहली रचना 'निशा निमंत्रण' को उन्होंने पढ़ा और वह इसे 100 गीतों का खंडकाव्य कहना ही पसंद करेंगे।

उन्होंने एक वाकया सुनाया एक बार मैं बच्चन के साथ कानपुर से कवि सम्मेलन में भाग लेने के लिए बाँदा जा रहा था। बस में बैठने की जगह नहीं थी बच्चनजी ने कहा तुम मेरी गोद में बैठ जाओ। तब से आज तक मैं उनकी परंपरा को आगे बढ़ा रहा हूँ।
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