बिजली चोरी को गुनाह बताते हुए प्रमुख इस्लामी संस्था ने मुसलमानों से इससे तौबा करने को कहा है।
भारत की प्रतिष्ठित इस्लामी संस्था दारूल उलूम देवबंद ने इस बारे दिए फतवे में कहा कि चोरी के जरिये बिजली का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है। दारूल उलूम का कहना है कि बिजली चोरी और अन्य चोरियों में कोई फर्क नहीं है।
इस्लाम में चोरी और दूसरे की संपत्ति के नाजायज इस्तेमाल की सख्त मनाही है। इसलिए बिना मीटर के गलत तरीके से बिजली का किसी भी कार्य के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता है।
एक व्यक्ति ने दारूल उलूम से इस विषय पर फतवा माँगा था। उसने पूछा था कि कुछ लोगों के पास बिजली के जायज कनेक्शन नहीं हैं और वे बिजली के बिल का भुगतान किए बिना उसका इस्तेमाल करते हैं।
यही नहीं, वे रमजान में चोरी की बिजली से हीटरों पर खाना पकाते हैं, रोजा अफ्तार बनाते हैं। क्या ऐसा करने की इस्लाम में अनुमति है? इस पर फतवा दिया गया, जी नहीं, इस्लाम में इस तरह की हरकतों की हरगिज अनुमति नहीं है।
फतवे का स्वागत : विश्व बैंक से जुड़े ऊर्जा विशेषज्ञ मोहिंदर गुलाटी ने इस फतवे का स्वागत करते हुए कहा कि देश की सम्मानित धार्मिक और सामाजिक संस्थाएँ तथा व्यक्ति अगर ऐसी पहल करें तो बिजली चोरी रोकने में काफी सहायता मिल सकती है। उन्होंने बताया कि भारत में बिजली चोरी की समस्या अत्यधिक विकराल रूप ले चुकी है। इसका अंदाजा इस अकेले तथ्य से लगाया जा सकता है कि हर साल यहाँ दो सौ अरब रुपए से अधिक की बिजली चोरी होती है, जो सकल घरेलू उत्पाद का डेढ़ प्रतिशत है।
ताजा सरकारी अनुमानों के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आपूर्ति होने वाली 42 प्रतिशत बिजली की चोरी हो जाती है। इस मामले में दिल्ली इतनी बदनाम है कि उसे बिजली चोरी की विश्व राजधानी कहा जाने लगा है। भारत जितनी बिजली चोरी किसी देश में नहीं होती। चीन में बिजली चोरी मात्र तीन प्रतिशत है।
नार्थ दिल्ली पावर लि. की एक अधिकारी ने कहा कि मध्य वर्ग में खर्च से कम भुगतान के लिए बिजली मीटरों के साथ छेड़छाड़ आम बात है। मध्य वर्ग के अलावा दिल्ली के उद्योग बहुत बड़े पैमाने पर बिजली चोरी करते हैं।
सूचना के अधिकार नियम के तहत हाल ही में केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण ने बताया कि 2004-05 के दौरान 17553.496 करोड़ यूनिट बिजली की चोरी हुई। इसे अगर प्रति यूनिट दो रुपए भी मान लें तो उस साल बिजली चोरी से 35 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।
प्रयास नामक एनजीओ के गिरिश संत ने कहा कि मामला भ्रष्टाचार का है। इसके चलते संबंधित अधिकारी आँखें मूँदे रहते हैं। राजनीतिज्ञ भी इन बिजली चोरों को अपने वोट बैंक के रूप में देखते हैं।
|