टाटा मोटर्स ने जगुआर और लैंड रोवर जैसे ब्रांड हाथ में ले लिए हैं, लेकिन इनकी हालत सुधारना आसान नहीं होगा। टाटा के पास अभी कार, ट्रक और बसों का काम है और इनको अब इन दो लक्जरी ब्रांड के साथ जोड़ना होगा।
फोर्ड मोटर्स के ये दो ब्रांड जुड़ने से देश की तीसरी सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी टाटा मोटर्स के पास अवसर तो बढ़ेंगे ही, परंतु साथ ही चुनौतियाँ भी कम नहीं होंगी। 10-12 साल पहले तक टाटा केवल ट्रक ही बनाती थी। आज वह एक लाख की नेनो से लेकर जगुआर और लैंड रोवर जैसे मॉडल पर सवारी करेगी।
फिलहाल कंपनी मध्यम दर्जे की कारें बना रही है। भारत और कुछ अन्य विकासशील देशों में कंपनी की अच्छी पकड़ रही है। परंतु फिर भी कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के लक्जरी और भारी-भरकम ब्रांड को कंपनी बेचेगी कहाँ, क्योंकि कंपनी की पकड़ जिन देशों में है, वहाँ इस तरह के मॉडलों की खपत कम ही है।
टाटा की पकड़ भारतीय वाणिज्यिक वाहन बाजार में करीब 60 फीसद की है। इसमें मिनी ट्रक से लेकर बसें तक बनाई जाती हैं। एक ओर टाटा ट्रक और मिनी बस की ओर ध्यान दे रही है और दूसरी ओर छोटी कारों की ओर जैसे इंडिका और रतन टाटा की महत्वकांक्षी परियोजना नेनो कार। ऐसे में जगुआर और लैंड रोवर जैसे अल्ट्रा प्रीमियम ब्रांड के लिए कंपनी कितना समय दे पाएगी।
ये कहती हैं रेटिंग एजेंसियाँ : मूडी'ज इन्वेस्टर सर्विस और स्टैंडर्ड एंड पूअर्स जैसी रेटिंग एजेंसियों ने जगुआर और लैंड रोवर की सौदेबाजी को लेकर टाटा मोटर्स की रेटिंग घटा दी है। जबकि 10 जनवरी को जब कंपनी ने नेनो पहली मर्तबा सार्वजनिक की थी तो उसे अव्वल स्थान पर रखा गया था। चूँकि यह अधिग्रहण काफी बड़ा होगा, इसलिए इसके लिए धन की व्यवस्था और प्रबंधन की चुनौती सामने खड़ी होगी।
सबसे ज्यादा नकारात्मक आशंका इस बात की है कि इसके लिए पैसा कहाँ से आएगा। मूडी'ज के अनुसार बढ़ता कर्ज अभी सबसे बड़ी चिंता है। यह सही है कि यह सौदा टाटा को दुनिया के नक्शे पर काफी आगे ले जाकर खड़ा कर देगा और तकनीकी उन्नयन भी हो जाएगा।
लंदन की ग्लोबल इनसाइट के विश्लेषक इयान फ्लेचर का कहना है कि देसी और विदेशी ब्रांड का एकीकरण और लागत की कमी भी बड़ी चुनौती खड़ी करेगी। इसके अलावा इन दोनों विदेशी ब्रांड को पर्यावरण की चुनौती भी झेलना पड़ेगी। जहाँ तक यूरोप की बात है तो वहाँ पर जगुआर और लैंड रोवर को कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
बाजार अनुकूल नहीं : जहाँ तक वर्तमान वैश्विक परिदृश्य की बात है तो बाजार में अभी कर्जों को लेकर भारी खींचतान के हालात हैं। टाटा मोटर्स के सामने भी प्रतिस्पर्धा सीना तानकर खड़ी है। इंडिका और इंडिगो के नए मॉडल के साथ नए ट्रक भी कंपनी ला रही है। इसके अलावा फिएट के साथ भी एक निर्माण करार है।
कहानी जगुआर की * इस कार को बनाने वाली कंपनी स्वालो साइडकार थी, जो 1922 में बनी थी * इसे बनाने वाले सर विलियम्स लायंस थे * इसमें करीब 10,000 कर्मचारी हैं * फोर्ड प्रीमियर इसकी पैतृक कंपनी है
मोटरसाइकल के शौकीन विलियम लायंस और विलियम वाल्मस्ले ने मिलकर एसएस जगुआर नाम की पहली कार 1935 में बनाई थी। 1945 में पूरी कंपनी को नाम जेगुआर दे दिया गया। लक्जरी सेलून और स्पोर्ट्स कार बनाने में कंपनी की महारथ थी। कंपनी ने 60 के दशक में डेमलर मोटर कंपनी (डेमलर बेंज नहीं) भी खरीद ली।
डेमलर नाम का इस्तेमाल जगुआर की सबसे लक्जरी कार के लिए किया गया। 1966 में इसका विलय ब्रिटिश मोटर कंपनी में हो गया और ब्रिटिश मोटर होल्डिंग्स नाम की कंपनी बनी। 1989 के सितंबर में फोर्ड मोटर कंपनी ने जगुआर को खरीदने की कोशिश की और 1999 में जगुआर, अस्टोन मार्टिन, वोल्वो के साथ फोर्ड का हिस्सा बन गई।
फोर्ड क्या करेगी? : शायद ही किसी ने सोचा होगा कि अपने दो खास ब्रांड जगुआर और लैंड रोवर को बेचने के बाद फोर्ड क्या करेगी। दरअसल कंपनी की हालत बेहद खराब है और ये दोनों ब्रांड बिकने से कंपनी टर्नअराउंड की स्थिति में होगी। इन दोनों को बेचने से जो धन कंपनी को मिलेगा, वह उसकी ताकत बन सकता है। अमेरिका में कार और ट्रक बेचने वाली यह कंपनी फिलहाल गर्दिश में चल रही है। पिछले दो साल में कंपनी को 15 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। कंपनी पुनर्संरचना के दौर में है।
अभी तक उत्तरी अमेरिका में इसके 16 संयंत्र बंद हो चुके हैं। यहाँ करीब हजारों लोगों की नौकरियाँ चली गई हैं। कंपनी ने लाभ में आने के लिए इनको निकाल बाहर किया। कंपनी अपना वित्तीय सेवा अंग भी बेचना चाहती है। इसके अलावा उसकी नजर में वोल्वो और मर्करी ब्रांड भी खटक रहे हैं। हालाँकि अभी वोल्वो को बेचने का विकल्प ठंडे बस्ते में पड़ा है।
ऐसी है लैंड रोवर * यह जीपनुमा गाड़ी है * 30 अप्रैल 1948 को पहली गाड़ी सड़क पर उतारी गई थी * यह मॉडल लीलैंड, ब्रिटिश एयरोस्पेस और बीएमडब्ल्यू के झंडे तले रहा है * जहाँ तक छोटे बहुपयोगी वाहनों की बात है तो यह सबसे लंबा समय तक चलने वाला वाहन है
पहले यह कार इंग्लैंड के बर्मिंघम के सोलिहल संयंत्र में बनाई जाती थी। कंपनी के मॉडल ब्राजील और तुर्की में कई स्थानों पर तैयार होते थे। 11 जून 2007 में फोर्ड ने लैंड रोवर बेचने की घोषणा की। इस जीप को मॉरिस विल्क्स ने 1947 में बनाया था। बताया जाता है कि दूसरे विश्वयुद्ध में अमेरिका की जीप से प्रभावित होकर इसे तैयार किया गया था। पहली लैंड रोवर जीप के चेसिस पर ही बनाई थी।
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