सत्ता पाने के लिए राजनैतिक दलों द्वारा भले ही आज समाज को फिरको में बाँटे जाने की कोशिश की जा रही हो पर अठ्ठाहरवीं सदी के मध्य अवध के नवाबों ने हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के बीच भाईचारा मजबूत करने के लिए महलों से बाहर निकल कर होली खेलने की जो परम्परा डाली थी उनके वंशज आज भी उसे निभा रहे हैं।
शाही परिवार एवं नवाबों के वंशजों द्वारा गठित रॉयल फैमली औफ अवध ने अवध क्षेत्र में गंगा-जमुनी तहजीब से होली खेलने की अनूठी परम्परा आज तक बनाए रखी है।
अवध के तीसरे बादशाह मोहम्मद अली शाह के वंशज तथा रॉयल फैमली ऑफ अवध के महासचिव शिकोह आजाद, अवध के प्रधानमंत्री नबाव अहमद अली खाँ मुनव्वरउद्दौला के खानदान से ताल्लुक रखने वाले नबाव इब्राहीम अली खाँ तथा बादशाह अमजद अली शाह खानदान और फिल्म जगत से जुड़े पप्पू पोलिस्टर सहित नवाबों के कई अन्य वंशजों ने कल खस और केवड़ा की खुशबू से भरपूर रंग-बिरगे गुलालों के साथ होली खेलते हुए गंगा-जमुनी तहजीब की परम्परा कायम रखी।
नफासत और नजाकत के लिए मशहूर लखनऊ शहर में जहाँ नवाबों के वंशजों ने घरों से बाहर निकल कर होली मनाई तो दूसरी तरफ पुराने लखनऊ में गंगा-जमुनी तहजीब के साथ होली पर निकलने वाले परम्परागत जुलूस का ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चो के अध्यक्ष डॉ. एमए सिद्दीकी के नेतृत्व में मुस्लिम समुदाय ने गुजिया और मिठाई और जगह-जगह फूलों की बरसात कर स्वागत किया।
नवाब खान ने बताया कि अवध की गंगा-जमुनी तहजीब वाली होली की शुरुआत अठारहवीं सदी के मध्य में नवाब सफदरजंग ने की थी, जिसमें नवाब खुद महलों से निकल कर होली खेला करते थे।
उन्होंने बताया कि कई बार तो ऐसे मौके भी आए हैं कि मोहर्रम और होली साथ-साथ पड़ गई तब गंगा-जमुनी तहजीब को कायम रखने के लिए जहाँ एक तरफ हिन्दुओं ने होली न खेलने जैसे फैसले लिए वहीं एक बार तो अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने मुहर्रम के दिनो में भी खुद पिचकारी हाथ में लेकर अपने अमले के साथ महल से बाहर आकर होली खेलना शुरू कर दिया।
अवध की गंगा-जमुनी तहजीब का जिक्र करते हुए नवाब खान ने बताया कि एक यह भी समय था जब अवध में गम और खुशी के त्योहार मुहर्रम और होली में दोनों फिरके शामिल हुआ करते थे और दोनों मौकों पर इतनी भीड़ होती थी कि इन त्योहारों को देखकर अंग्रेजो को रंज होता था और तभी एकता को कमजोर करने के लिए हमारे त्योहारों पर सबसे ज्यादा हमले अंग्रेजों ने किए।
ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चे के अध्यक्ष डॉ. एमए सिद्दीकी का मानना है कि त्योहार ऐसे सशक्त माध्यम हैं कि अगर इन्हें मिलजुल कर मनाया जाए तो सियासतदानों की फिरको में बाँटने की तुच्छ राजनीति को धूल चटाया जा सकता है और त्योहारों के जरिये ही प्रेम की बुनियाद पर हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल कायम ही नहीं की जा सकती, बल्कि देश को विकास के रास्ते पर लाकर एक बार फिर हिन्दुस्तान को सोने की चिड़िया बनाया जा सकता है।
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