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स्कोर्पीन मामले में देरी से जाँच को नुकसान
16000 करोड़ रुपए के स्कोर्पीन पनडुब्बी सौदे में कथित दलाली संबंधी जाँच करने में देरी के चलते सीबीआई को कोई सुराग ही नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि विदेशी दूरसंचार कंपनी ने जाँच एजेंसी को बताया है कि वह 12 माह से अधिक पुराने रिकार्ड नहीं रखती।

गत वर्ष दिसंबर में दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देश पर उपयुक्त जाँच शुरू की गई थी। तब तक कुख्यात नौसैनिक युद्ध कक्ष लीक कांड को उजागर हुए दो साल का समय बीत चुका था।

जाँच एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया सीबीआई को इस कांड की जाँच करने के लिए फरवरी 2006 में निर्देश दिया गया था और तब तक सबूतों को काफी नुकसान पहुँच चुका था।

अधिकारी ने बताया विवादास्पद व्यापारी अभिषेक वर्मा (2006 के बाद से न्यायिक हिरासत में) से बरामद एक स्विस कंपनी के सिम कार्ड के विवरण माँगने संबंधी सीबीआई के आग्रह का कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि दूरसंचार कंपनी ने जाँच एजेंसी को सूचित किया कि वह 12 माह से अधिक पुराने रिकार्ड अपने पास नहीं रखती।

सीबीआई अधिकारी ने कहा फरवरी ‍2006 में जाँच सौंपे जाते समय उसमें स्कोर्पीन सौदे की जाँच का काम शामिल नहीं था और यह केवल नौसेना युद्ध कक्ष लीक मामले की जाँच तक ही सीमित था। अब कई महीने बीत चुके हैं और फिलहाल करने को कुछ खास बाकी बचा नहीं है।

सीबीआई के सूत्रों के अनुसार यहाँ तक कि जाँच की जाने वाली कंपनियों के इंटरनेट सर्वर बदल चुके हैं और उस ग्लोबल इंटरनेट सर्च इंजन से भी कोई सहयोग नहीं मिल पा रहा है जिसके सर्वर का इस्तेमाल ईमेल भेजने के लिए किया जा रहा था।

एक जनहित याचिका के आरोपों के संबंध में सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने गत वर्ष 20 दिसंबर को सीबीआई से कहा था कि वह सौदे में दलाली के आरोपों की नए सिरे से प्राथमिक जाँच करे।
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