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देश में तीसरा विकल्प जरूरी-भाकपा
वामपंथी और लोकतांत्रिक सिद्धांतों में तालमेल बैठाते हुए देश की राजनीति में एक तीसरा विकल्प कायम करने के आह्वान के साथ भाकपा की बीसवीं राष्ट्रीय कांग्रेस रविवार को यहाँ शुरू हुई।

पार्टी महासचिव एबी बर्धन ने उद्घाटन भाषण में कहा कि हमारी पार्टी का मानना है कि यही समय है, जब हमें वाम और लोकतांत्रिक ताकतों के तालमेल से और लोकहितकारी मुद्दों को उठाते हुए कांग्रेस और भाजपा दोनों के अलावा एक तीसरा विकल्प कायम करने का पुरजोर प्रयास करना चाहिए।

पार्टी की इस चार दिवसीय कांग्रेस में एक हजार से ज्यादा प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। इनमें 30 देशों से आए कम्युनिस्ट मेहमान भी शामिल हैं। कांग्रेस में भारत-अमेरिका परमाणु सौदा, बढ़ती महँगाई, कृषकों के समक्ष उत्पन्न संकट और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्याओं के साथ-साथ बहुत से अन्य मुद्दों पर विचार होगा और इसके अलावा अगले आम चुनाव की रणनीति भी तैयार की जाएगी।

कांग्रेस में पार्टी के वरिष्ठ नेता डी. राजा और एस. सुधाकर रेड्डी के साथ-साथ माकपा आल इंडिया फारवर्ड ब्लॉक और रेवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के नुमाइंदे भी भाग ले रहे हैं।

अगले आम चुनाव से पूर्व पार्टी के राजनीतिक एजेंडा की रूपरेखा बताते हुए बर्धन ने वाम एकता को मजबूत बनाने की जरूरत को रेखांकित किया क्योंकि उनके अनुसार इसीके जरिये देश की राजनीति में तीसरा विकल्प कायम किया जा सकता है।

तीसरा विकल्प कायम करने के इच्छुक यूएनपीए के घटक दलों का सीधा उल्लेख किए बिना बर्धन ने कहा कि देश में कई अन्य धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक दल और समूह हैं, जो ऐसे विकल्प की तलाश में हैं। हमें उनसे संवाद कायम करना है और इस तरह का एक विकल्प कायम करने के लिए उन्हें अपने साझा संघर्ष में शामिल करना है।

इसी तरह के विचार व्यक्त करते हुए माकपा के महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि एक तीसरा विकल्प गठित करने और उसे जनता के सामने पेश करने के लिए वामपंथी पहल की जरूरत है। उन्होंने कहा वामपंथी एकता की बुनियाद पर ही इस दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

कम्युनिस्ट पार्टी की यह बैठक केंद्र की कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के साथ परमाणु सौदे के अलावा बहुत से राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर जारी तकरार की पृष्ठभूमि में हो रही है।

बर्धन ने कहा कि संप्रग सरकार जानबूझकर न्यूनतम साझा कार्यक्रम के प्रावधानों का उल्लंघन कर रही है, जबकि इस कार्यक्रम में एक ऐसी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है, जिसका लक्ष्य बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विकास करना है।

उन्होंने कहा कि हमें सरकार की नीतियों को लेकर बहुत चिंता हो रही है क्योंकि वह कदम-दर-कदम भारत और अमेरिका के बीच करीबी सामरिक भागीदारी की ओर बढ़ रही है। परमाणु समझौता परमाणु ऊर्जा तक पहुँच कायम करने का निर्दोष प्रयास मात्र नहीं है बल्कि उसके साथ एक सामरिक भागीदारी को ढँकने का प्रयास है।
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