मालवा के नाम को 'महाकाल' से जोड़कर देखा जाता है और होली के दिन तो यहाँ की रंगत ही कुछ और होती है।
फिजाँ में उड़ते ढेरों रंगों के बीच उज्जैन के ज्योतिर्लिंग महाकाल को भाँग वाली ठंडाई का भोग लगाया जाता है और अपनी इसी विशेषता के कारण यहाँ की होली दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।
अवंतिका नगरी (वर्तमान का उज्जैन) के राजा महाकाल को होली के दिन ठंडाई का प्रसाद चढ़ाए जाने की परंपरा सदियों पुरानी है। ज्योतिर्लिंग महाकाल को भोग लगाया गया यही प्रसाद श्रद्धालुओं में भी वितरित किया जाता है।
उज्जैन ही नहीं, बल्कि पूरे मालवा में भाँग घोंटने के ठीये जगह-जगह नजर आने लगते हैं और यही संकेत होता है फाल्गुन की पूर्णिमा के पास आने का।
भारत के हृदयस्थल यानी मालवा-निमाड़ और आसपास के क्षेत्रों में बड़े ही अनोखे ढंग से होली मनाई जाती है। देश के अन्य भागों के समान यहाँ पर होली मात्र एक दिन तक सीमित न होकर लगातार पाँच दिन तक मनाई जाती है।
पहला दिन होता है फाल्गुन की पूर्णिमा यानी होलिका, दहन दूसरे दिन धुलेंडी पर अबीर-गुलाल लगाया जाता है और यह दौर जारी रहता है पाँचवें और अंतिम दिन रंगपंचमी तक। रंगपंचमी पर पानी और पक्के रंग से होली खेली जाती है।
मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ क्षेत्र और गुजरात की सीमा से सटे प्रदेश के कुछ गाँवों में आदिवासियों के प्रणय पर्व भगोरिया हाट का आयोजन किया जाता है। इन क्षेत्रों में इसे देखने आए देशी-विदेशी पर्यटकों का मेला-सा लग जाता है। इस बार का भगोरिया हाट 16 मार्च से 21 मार्च तक झाबुआ, छकतला, आलीराजपुर, भाभरा, थाँदला, बरवेट, उमरकोट, कल्याणपुरा, जोबट, चैनपुरा आदि गाँवों में अलग-अलग दिन चला। भगोरिया हाट में आदिवासी युवक-युवतियाँ बड़े ही अनोखे ढंग से अपने जीवन साथी का चुनाव करते हैं। आदिवासी युवक जिस युवती को अपने जीवन साथी के रूप में देखना चाहते हैं, उसे पान का बीड़ा पेश करते हैं और लड़की के पान ले लेने का मतलब होता है कि वह भी युवक को पसंद करती है।
इसके बाद घरवाले उनका रिश्ता तय कर देते हैं। भगोरिया हाट में रंग-बिरंगी साइकिलों पर आए युवकों और सजी-धजी आदिवासी युवतियों का रोमांच और उत्साह अलग ही होता है।
मध्यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में होली के दिन एक और रोमांचक नजारा देखने को मिलता है। आदिवासी लोग अपनी मन्नतों को पूरा करने के लिए जलते अंगारों पर चलते हैं।
महिदपुर और धार क्षेत्र में ये लोग होली के दिन फेरी भी लगाते हैं। फेरी में आदिवासी युवक-युवतियाँ ढोल-ताशे और थाली बजाते हुए घर-घर जाकर गुड़, गेहूँ माँगते हैं।
मालवा में होली के आठ दिन पहले से होलाष्टक लग जाता है। इस दौरान किसी भी प्रकार के माँगलिक कार्य करने की अनुमति नहीं होती है और होलिका दहन के बाद ही माँगलिक कार्यों की शुरुआत हो पाती है। यहाँ पर होलिका दहन में पकवानों और गोबर से बने गहने अर्पित किए जाते हैं। होलिका दहन वाले दिन से लेकर रंगपंचमी तक प्रत्येक दिन होलिका की सात परिक्रमा कर जल अर्पित करने की भी परंपरा है। होलिका दहन के दूसरे दिन धुलेंडी के बाद से गोठ आयोजित करने की बड़ी पुरानी परंपरा यहाँ आज भी कायम है। गोठ यानी सामाजिक मिलन समारोह में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग शहर से बाहर जाकर खाना पकाते और फिर मिलजुलकर उसे खाते तथा खुशियाँ मनाते हैं।
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