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आडवाणी को गलत समझा गया-वाजपेयी
पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी का मानना है कि लंबे समय से उनके सहयोगी रहे लालकृष्ण आडवाणी को गलत समझा गया है और यह विडंबना ही है कि वे छवि और वास्तविकता के बीच के विरोधाभास के शिकार बन गए।

आडवाणी के साथ अपने रिश्तों को याद करते हुए वाजपेयी ने कहा कि 50 साल से अधिक समय से जनसंघ के लिए काम करने के समय से ही वे दोनों आपस में मित्र और साथी रहे हैं।

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार आडवाणी द्वारा लिखित पुस्तक 'माई कंट्री माई लाइफ' की प्रस्तावना में वाजपेयी ने कहा कि घटनाक्रमों से भरे राजनीति जीवन के लंबे सफर में आडवाणी को अकसर गलत समझा गया और इसके परिणामस्वरूप वे छवि और वास्तविकता के बीच के विरोधाभास के शिकार बन गए।

उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने आडवाणी के साथ काम किया है, वे उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में जानते हैं जिसने राष्ट्रवाद के अपने विश्वास के साथ कभी समझौता नहीं किया, लेकिन इसके बावजूद स्थिति की जब-जब माँग हुई, उन्होंने राजनीतिक प्रतिक्रियाओं में लोच दिखाई।

वाजपेयी ने परोक्ष रूप से यह भी स्वीकार किया कि लंबे रिश्तों में कई मुद्दों पर उनके आडवाणी के साथ मतभेद भी रहे। उन्होंने कहा कि यह संभव नहीं है कि एक संगठन में पचास साल तक साथ काम करने वाले दो व्यक्तियों के बीच सब विषयों के प्रति हमेशा एक जैसी राय हो।

पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि हालाँकि यह मतभेद नहीं है, बल्कि उद्देश्यों और कार्रवाई की एकता है, जो हमारे रिश्तों की खासियत है। उन्होंने कहा कि विचारों में भिन्नता दोनों के बीच कभी विभाजन का कारण नहीं बनी।

अगले 12 महीने में चुनाव का सामना करने जा रही भाजपा के लिए वाजपेयी ने कुछ नसीहत भी दी। उन्होंने कहा कि पार्टी के भीतर भाईचारे को बनाए रखना और उसे मजबूत करना भविष्य के विकास का मार्गदर्शन होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मतभेदों को लक्ष्मण रेखा पार नहीं करने देने का आत्मानुशासन लगाना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि पार्टी और देश के लिए क्या अच्छा है, इस बात को याद रखना ही दीर्घकाल की सफलता की सबसे बड़ी गारंटी है।

वाजपेयी ने कहा कि साथ काम करने का दर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए जरूरी है। उन्होंने आडवाणी को असाधारण नेता बताया।
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