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कर्नाटक बजट के बहाने लोकतंत्र की चिंता
पिछले लगभग चार दशक बाद पहली बार कर्नाटक का बजट पर लोकसभा में चर्चा हुई और इस चर्चा के बहाने सभी दलों ने राज्य में तत्काल लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित किए जाने की दुहाई दी। कर्नाटक राज्य के बजट पर इससे पहले 1971 में संसद में चर्चा हुई थी। उस समय भी राज्य में राष्ट्रपति शासन था।

वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने कर्नाटक के लेखानुदान माँगों पर सदन में चर्चा का उत्तर देते हुए कहा कि इस स्थिति के लिए उनकी पार्टी (कांग्रेस) कहीं से जिम्मेदार नहीं है। उन्होंने भाजपा और जद (एस) का नाम लिए बिना कहा कि इस हालात के लिए वे ही लोग सबसे जिम्मेदार हैं, जिनके सदस्य सदन में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान सबसे ज्यादा आवाज उठा रहे हैं।

वित्तमंत्री के जवाब के बाद सदन ने छह महीने के राज्य के लेखानुदान माँगों और वर्ष 2007-08 के लिए कर्नाटक राज्य के संबंध में अनुदानों की अनुपूरक माँगों को ध्वनिमत से मंजूरी दे दी।

पूरी तरह मूड में दिख रहे चिदंबरम ने कहा कि वह कर्नाटक का बजट पेश करते हुए गौरवान्वित और स्वयं को कर्नाटक का नागरिक महसूस कर रहे हैं, लेकिन वह नहीं चाहते कि राज्य में 'राजनीतिक शून्यता की' ऐसी स्थिति दोबारा पैदा हो और उन्हें पुन: ऐसा सम्मान मिले।

कर्नाटक में हुए विकास और लोकप्रिय कार्यों का श्रेय लेने के भाजपा सदस्यों के प्रयास पर व्यंग्य करते हुए वित्तमंत्री ने कहा कि ऐसा लगता है कि संविधान बदल गया है और राज्य में मुख्यमंत्री नहीं बल्कि उप मुख्यमंत्री ही सारे ऐसे कार्यों को अंजाम दे रहे हैं।
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