पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में 35 साल गुजारने वाले कश्मीरसिंह की रिहाई से अन्य भारतीय युद्धबंदियों के परिजनों को भी उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी है कि कश्मीरसिंह की तरह उनके अपने भी एक न एक दिन रिहा होकर अपने देश वापस लौट आएँगे।
युद्धबंदियों के परिजनों का कहना है कि जिस तरह पाकिस्तान के मानवाधिकार संगठन अंसार बर्नी ट्रस्ट के प्रयासों से कश्मीर की रिहाई हुई है उसी तरह एक दिन उनके अपनों के लिए भी कोई मददगार उठेगा और उनकी स्वदेश वापसी की राह आसान होगी।
मिसिंग डिफेंस पर्सनल रिलेटिव एसोसिएशन का दावा है कि 1971 की लड़ाई के 54 भारतीय युद्धबंदी आज भी पाकिस्तान की सैन्य जेलों में कैद हैं, जिनमें से कई तो विक्षिप्त हो चुके हैं।
एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. बीके सूरी ने कहा कि इन 54 युद्धबंदियों में उनके भाई मेजर अशोक सूरी भी शामिल हैं।
फ्लाइट लेफ्टिनेंट विजय वसंत तांबे का नाम भी 1971 के युद्ध में लापता उन भारतीय सैन्य अधिकारियों की सूची में शामिल है, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे आज भी पाकिस्तान की जेलों में नरक से बदतर जीवन जीने को मजबूर हैं।
बीके सूरी के पास इस दावे के पुख्ता सबूत हैं। उनके पास उनके भाई द्वारा पाकिस्तान की जेलों से लिखे गए वे पत्र भी शामिल हैं, जो गोपनीय तरीके से उनके परिवार के पास पहुँचे।
कश्मीर सिंह की रिहाई कराने वाले पाकिस्तान के कार्यवाहक मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी के उस बयान ने भी युद्धबंदियों के परिजनों को एक बार फिर उम्मीद की किरण दिखाने का काम किया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि उनका मानवाधिकार संगठन पाकिस्तान की जेलों में बंद भारतीय युद्धबंदियों को रिहा कराने के प्रयास भी करेगा। डॉ. सूरी ने कहा कि बर्नी के बयान से यह साफ हो जाता है कि 1971 की लड़ाई में लापता हुए 54 भारतीय अधिकारी आज भी पाकिस्तान की जेलों में बंद हैं। उन्होंने कहा कि उनकी वर्षों पहले भी अंसार बर्नी से इस मुद्दे पर बात हुई थी, लेकिन तब कोई कामयाबी नहीं मिली।
डॉ. सूरी ने कहा कि 35 साल बाद हुई कश्मीर की रिहाई से उन्हें एक बार फिर से उम्मीद बँधी है कि एक न एक दिन उनके भाई सहित अन्य भारतीय युद्धबंदी भी वतन वापस आ सकेंगे।
उन्होंने कहा कि युद्धबंदी पिछले 37 बरस से पाकिस्तान की जेलों में बंद हैं और 37 साल का अरसा जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा होता है। ऐसे में अब उनके प्रति रहम दिखाया जाना चाहिए। डॉ. सूरी कश्मीरसिंह की रिहाई से खुश हैं और यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन उनका भाई भी आजाद होगा और अन्य युद्धबंदी भी।
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