पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में 35 साल गुजारने के बाद आजाद हुए कश्मीरसिंह मंगलवार को सीमा पार कर भारत पहुँच गए, जहाँ वाघा सीमा पर उनका अपनी पत्नी से भावुक मिलन हुआ।
कश्मीरसिंह को 1973 में जासूसी के आरोप में पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में गिरफ्तार किया गया था। जब उनकी गिरफ्तारी हुई तो उस समय वह 32 साल के जवान थे, लेकिन अब वह 67 साल के हो चुके हैं। उनकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पाकिस्तानी जेलों की काल कोठरियों में तबाह हो चुका है।
कश्मीर ने आज अपराह्न सीमा पार की और वह अपने वतन भारत पहुँच गए। पाक राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने 28 फरवरी को उन्हें क्षमादान दे दिया था। पाकिस्तान के कार्यवाहक मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी ने सिंह की रिहाई में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बर्नी को कश्मीर उस समय लाहौर सेंट्रल जेल में मिले थे, जब वह कैदियों के मानवाधिकारों और सुधारों को लेकर जेलों के दौरे पर थे। बर्नी भी उस पाकिस्तानी दल में शामिल थे, जो सिंह को सीमा तक लेकर आया।
जब सिंह वाघा सीमा पर इंतजार कर रही अपनी पत्नी परमजीत कौर के पास पहुँचे तो उन्होंने कहा कि मेरी कोई मनोकामना अधूरी नहीं रही। अब मुझे सब कुछ मिल गया है। मैं पाक राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी का शुक्रिया अदा करता हूँ। मैं पाक सरकार और पाकिस्तान के लोगों का बहुत आभारी हूँ।
कश्मीर ने कहा कि भारत सरकार को भी पाकिस्तानी कैदियों के बारे में ऐसा ही कदम उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे अब बाबा फरीद की मजार पर चादर चढ़ाने के लिए वैध भारतीय पासपोर्ट के साथ पाकिस्तान जाना चाहेंगे।
उम्मीद के सहारे जिंदा रहा : सिंह ने सीमा पार करने से पहले लाहौर में कहा था कि सिर्फ उम्मीद ने उन्हें जीवित रखा। सफेद रंग की कमीज और भूरे रंग का पेंट पहने सिंह ने जासूसी के आरोपों से इनकार किया और कहा कि हाँ, मुझ पर जासूसी और तस्करी के आरोप लगाए गए थे लेकिन मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। जब मुझे गिरफ्तार किया गया तो गिरफ्तार करने वालों को मेरे पास से कुछ भी नहीं मिला था।
रिहाई पर भावुक हुए सिंह ने कल लाहौर की कोट लखपत जेल से खुली हवा में बाहर आने के बाद रात एक पाँच सितारा होटल में गुजारी। 35 साल बाद उन्होंने पहली बार सितारों से भरा आसमान देखा। उन्होंने कहा कि सिर्फ उम्मीद ने मुझे जीवित रखा। यदि उम्मीद नहीं होती तो मौत की सजा के साए में जीवित रहना कठिन होता।
पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने सिंह को मौत की सजा सुनाई थी लेकिन बाद में इस पर रोक लगा दी गई थी। गले में माला पहने सिंह सीमा पार करने से पहले पाकिस्तानी दल के सदस्यों से गले मिले खासकर बर्नी और उनके बेटे से।
सरकारी कार में सफर : सभी पाकिस्तानी टीवी चैनल वाघा सीमा से सिंह के भारत प्रवेश का सीधा प्रसारण कर रहे थे। पंजाब पुलिस के पूर्व कांस्टेबल कश्मीरसिंह ने जैसे ही वाघा सीमा के द्वार को पार करने के लिए कदम रखे तो पाकिस्तानी दल ने तालियाँ बजाईं। भारतीय अधिकारियों ने उन्हें पुष्प गुच्छ और मिठाई भेंट की।
बर्नी ने इस घटना को 'प्रेम के वृक्ष' के रूप में परिभाषित किया जिसके फलों का लुत्फ भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के लोग उठा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह पहली बार हुआ है जब रिहा हुए किसी कैदी ने पाकिस्तान के झंडे वाली किसी सरकारी कार में सफर किया।
पत्नी का संघर्ष रंग लाया : उन्होंने कहा कि वह कोई शर्त नहीं रख रहे लेकिन उन्हें उम्मीद है कि बदले में भारत भी ऐसा ही कदम उठाएगा। भारत की माटी से स्पर्श होने के तत्काल बाद सिंह को सीमा सुरक्षा बल के सम्मेलन कक्ष में ले जाया गया, जहाँ उनकी अपने परिवार के सदस्यों से मुलाकात हुई। सिंह की 65 वर्षीय पत्नी उनकी रिहाई के लिए वर्षों से संघर्ष कर रही थीं।
जिस समय सिंह को गिरफ्तार किया गया था उस समय उनके तीनों बच्चों अमरजीतसिंह, शशपालसिंह और मंजीत कौर की उम्र क्रमश: सात, तीन और एक साल थी।
अमरजीत इस समय इटली में है, जबकि उसकी पत्नी और बेटी अमनीत (16), बेटा गुरमिंदर (10) सिंह की पत्नी परमजीत कौर के साथ रह रहे हैं। शशपाल किसान है तथा वह भी परमजीत कौर के साथ पंजाब के गाँव में ही रहता है। युद्धबंदियों के परिजनों को बँधी आस
|