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मैं चुनाव तय नहीं करता-चिदंबरम
तोहफों से भरे बजट के कारण समय से पूर्व चुनाव की अटकलों पर वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम का कहना है कि यह तय करना मेरा नहीं यह तो संप्रग नेतृत्व का काम है।

समय से पहले चुनाव की संभावनाओं को साफ खारिज करने की जगह चिदंबरम ने कहा- मैं संप्रग का नेता नहीं हूँ। मैं चुनाव की तारीख तय नहीं करता। मैं अपना काम करता हूँ। चुनाव की तारीख तय करना संप्रग नेतृत्व का काम है।

बातचीत में वित्तमंत्री से सवाल था कि क्या उन्हें समय से पूर्व चुनाव की आशंका है या फिर चुनाव तय समय पर होंगे। इसी सवाल पर उनका कहना था भारत में हर साल ही चुनावी साल होता है।

2005 हो, 2006 हो, 2007 हो या फिर 2008 ही क्यों न हो। इसका मतलब तो यह हुआ कि कोई भी वित्तमंत्री बजट ही पेश नहीं करे। मेरी मानें तो राज्यों और केन्द्र के चुनाव पाँच साल में एक बार होने चाहिए लेकिन यह हकीकत नहीं है।

बजट पेश करने के बाद मीडिया को विशेष साक्षात्कार देने में लगातार व्यस्त वित्त मंत्री सवालों के विस्तार में जाने के लिए सटीक जवाब देते हैं। उनसे पूछा गया कि बजट की तैयारी के क्रम में क्या आपको संप्रग अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने कोई सुझाव दिया था। उनका दो टूक जवाब था, नहीं संप्रग अध्यक्ष ने मुझसे कुछ नहीं कहा।

इस बजट में किसानों को कर्ज मुक्ति और राहत को चुनावी चश्मे से देखने वाले कम नहीं हैं। साथ ही बजट पेश होते ही हर कोई श्रेय के संग्राम में जुट गया है।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने श्रेय लेने के लिए आज के समाचार-पत्रों में पूरे पृष्ठ का विज्ञापन जारी किया। इस विज्ञापन में दावा किया गया है कि 1978 में मुख्यमंत्री बनने के बाद राकांपा नेता शरद पवार ने महाराष्ट्र में पहली बार किसानों की कर्ज मुक्ति की थी।

वहीं कुछ नेता 'गुड़ खाए और गुलगुलों से परहेज' के अंदाज में कर्ज मुक्ति प्रस्तावों का सीधे विरोध तो नहीं कर रहे हैं लेकिन इससे सहकारी और वाणिज्यिक बैंकों को होने वाले नुकसान की चिंता से ग्रस्त हैं।

संप्रग के सहयोगी वाम दल, भाकपा महासचिव एबी वर्धन ने इससे सहकारी बैंकों का भट्ठा बैठने की आशंका जाहिर की है। वहीं योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष योगेन्द्र कुमार अलघ को विश्वनाथ प्रतापसिंह के प्रधानमंत्री काल में किसानों को 10 हजार करोड़ रुपए की कर्ज माफी के कारण बैंकिंग व्यवस्था को हुई क्षति की याद आ रही है।

इस बाबत सवाल पर चिदंबरम ने जवाब दिया कि मैं कह चुका हूँ कि जितनी भी कर्ज माफी होगी उसके बराबर की राशि बैंकों को उपलब्ध करा दी जाएगी। प्रोफेसर अलघ भी इस बात को समझेंगे, जहाँ बर्धन का सवाल है मुझे कुछ नहीं कहना। उनका यह भी मानना था कि जो भी इस मामले में मीनमेख निकालेगा, उसे लोग किसानों की कर्ज मुक्ति के विरोध में खड़ा हुआ मान सकते हैं।
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