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आत्मरक्षा व्यक्ति का अधिकार-सुप्रीम कोर्ट
उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि हमले की स्थिति में आम आदमी को आत्मरक्षा के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति पीपी नावलेकर और न्यायमूर्ति लोकेश्वर पंटा की खंडपीठ ने पंजाब के अंतराम की हत्या के दोषी बाबूराम और इंद्रराज को आजीवन कारावास की सजा देने के फैसले को दरकिनार करते हुए यह व्यवस्था दी है।

अंतराम ने तीन मार्च 1993 को इंद्रराज पर तो हमला किया ही, पति के बचाव में सामने आई माया को निशाना बनाया। इस घटना के दौरान बाबूराम और इंद्रराज ने आत्मरक्षार्थ अंतराम पर प्रतिघात किया, जिसमें उसकी मौत हो गई।

इस मामले में निचली अदालत ने दोनों अभियुक्तों को हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जिसे उन दोनों ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में चुनौती दी। हालाँकि उच्च न्यायालय ने आत्मरक्षा के अधिकार के तहत दोनों याचिकाकर्ताओं को किसी तरह की राहत देने से इनकार कर दिया।

खंडपीठ ने गत शुक्रवार को अपने फैसले में कहा कि दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनने के बाद हम इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि उच्च न्यायालय के फैसले में कुछ त्रुटियाँ रह गई।

न्यायालय ने कहा कि हम अधीनस्थ न्यायालयों के उस फैसले से सहमत नहीं हैं कि अभियुक्त इंद्रराज को खुद की या अपनी पत्नी की रक्षा करने का व्यक्तिगत अधिकार नहीं है। अंतराम ने तेज धार कटार और उसके कुंदे से इंद्रराज पर छह-सात वार किए थे।

न्यायालय ने कहा कि हमारा मानना है कि ऐसी स्थिति में इंद्रराज ने खुद की और पत्नी की जान के खतरे को भाँपते हुए आत्मरक्षा में जो कदम उठाए वह अंतराम के लिए घातक साबित हुआ।

खंडपीठ ने इस मामले में बाबूराम, इंद्रराज और उसके बेटे सूरजदेव को दोषी ठहराने और सजा देने के फैसले को दरकिनार करते हुए उनलोगों की तत्काल रिहाई के आदेश दिए। बशर्ते किसी अन्य मामले में वे वांछित न हों।
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