उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि किसी पद के लिए चुने जाने का अधिकार अनिश्चितकाल के लिए नहीं हो सकता क्योंकि नागरिकों के पास विकास का मानवाधिकार होता है और इस तरह के पदों पर नियुक्ति का आधार सिर्फ योग्यता होनी चाहिए।
न्यायमूर्ति एसबी सिन्हा और न्यायमूर्ति वीएस सिरपुरकर ने उच्च न्यायालय के एक फैसले के खिलाफ झारखंड राज्य की अपील स्वीकार करते हुए यह व्यवस्था दी। उच्च न्यायालय ने बिहार में उन लोगों को वरीयता देने का निर्देश दिया था, जिनकी नियुक्तयाँ 1996 के चारा घोटाले का पता लगने के बाद रद्द कर दी गई थी।
ये सभी नियुक्तियाँ राँची के पशुपालन विभाग के क्षेत्रीय निदेशक ने प्रोजेन सीमेन बैंक प्रोजेक्ट में तकनीकी सहायक के पद पर अस्थाई तौर पर की थीं। इनमें से कुछ लोग बर्खास्तगी के खिलाफ उच्च न्यायालय गए। न्यायालय ने इन लोगों को आयु सीमा में छूट देने तथा उनके अनुभवों के आधार पर उन्हें वरीयता देने का निर्देश दिया। न्यायालय ने यह राहत उन लोगों को भी देने का निर्देश दिया जो अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ न्यायालय नहीं गए।
उच्चतम न्यायालय ने 14 फरवरी के अपने फैसले में कहा कि रोजगार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव आ गया है। दस वर्ष बीत गए। एक नया राज्य अस्तित्व में आ गया। इस दौरान हजारों लोगों ने इसीके समकक्ष या उससे ज्यादा योग्यता हासिल कर ली। इन लोगों ने रोजगार कार्यालयों में अपना पंजीकरण कराया। विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में अवसर सीमित हैं। यदि उच्च न्यायालय के आदेश को लागू कर दिया जाएगा तो जिन लोगों की अभी इन पदों पर नियुक्तियों के लिए विचार किया जा रहा है, वे इससे बाहर हो सकते हैं।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत प्राप्त समानता के अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए। कोई भी आदेश पारित करते समय हमें उन लोगों के हितों को नहीं भूलना चाहिए जो हमारे सामने नहीं है। नागरिकों के पास विकास का मानवाधिकार होता है और इस तरह के पदों पर नियुक्तियों का आधार सिर्फ योग्यता होनी चाहिए।
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