विधि आयोग ने बुधवार को न सिर्फ लड़के और लड़कियों की शादी की उम्र समान करने की सिफारिश की, बल्कि पुरूषों के विवाह की उम्र घटाकर 18 साल करने का भी सुझाव दिया। इसके साथ ही आयोग ने 16 साल से कम उम्र के विवाह को अवैध करार देने की वकालत की है।
ए.आर. लक्ष्मणन के नेतृत्व वाले आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि लड़कों और लड़कियों दोनों की शादी की उम्र 18 साल होनी चाहिए, क्योंकि ऐसा कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है कि यह क्यों अलग-अलग हो।
सोलह साल से नीचे के विवाहों को अवैध घोषित करने का आयोग का सुझाव कुछ ऐसा है जो अनुसूचियों में अनुसंशित नहीं है। इसने शादियों के अनिवार्य पंजीकरण पर भी जोर दिया है और सिफारिश की है कि महिलाओं की तरह ही पुरूषों को 18 साल में शादी करने की अनुमति होनी चाहिए और इससे कम उम्र के बच्चों में इसे प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
कानून एवं न्याय मंत्री हंसराज भारद्वाज को आज पेश अपनी 44 पन्नों की रिपोर्ट में आयोग ने यह भी प्रस्ताव किया है कि यौन संबंध की स्वीकृति की उम्र विवाह पर ध्यान दिए बिना सभी लड़कियों के लिए 15 साल से बढ़ाकर 16 साल की जानी चाहिए।
सरकार यदि इसे स्वीकार करती है तो 16 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ रजामंदी से बनाए गए यौन संबंध पर बलात्कार के लिए निर्धारित सजा मिल सकती है। सोलह साल से कम उम्र की अपनी नाबालिग पत्नी के साथ किसी व्यक्ति का यौन संबंध भी दंडनीय हो सकता है।
मौजूदा कानूनों के तहत 15 साल से ऊपर की उम्र की नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध बलात्कार नहीं है।
विवाह के अनिवार्य पंजीकरण की सिफारिश करने के साथ ही आयोग ने प्रस्ताव किया है कि 16 और 18 साल के बीच के बच्चों के बीच होने वाले विवाह को अमान्य (जो वयस्कता हासिल करने पर दोनों पक्षों के आपसी सहमति से निरस्त हो सकता है) घोषित किया जाए।
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 के अध्ययन में आयोग ने पाया कि मौजूदा कानून तब भी बाल विवाह को अवैध नहीं करता, जबकि यह 15 साल से कम उम्र में हुई हो। लेकिन अपराध न्याय कानून भादंसं की धारा 375 पंद्रह साल से कम उम्र के बच्चे से यौन संबंध अपराध बनाता है।
आयोग ने विगत वर्षों में न्याय पालिका द्वारा अपनाए गए रूख का अध्ययन किया जिसमें बाल विवाह (प्रतिबंध) अधिनियम 1929 द्वारा तय उम्र की आवश्यकता का उल्लंघन कर किए गए विवाहों की वैधता को स्वीकार किया गया।
रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक हालिया फैसले में दोहराया कि हिन्दू विवाह अधिनियम 1965 में तय शर्तों का उल्लंघन करते हुए विवाह न तो अमान्य हैं न हीं अमान्य योग्य।
अदालत ने कहा कि फैसला सार्वजनिक नीति पर आधारित था और विधायिका इस तथ्य से सचेत थी कि यदि विवाह उम्र की बंदिश का उल्लंघन कर किया गया हो तो उनका शून्य या शून्य योग्य बनाया जाना, गंभीर दुष्परिणाम और महिलाओं का शोषण ला सकता है।
इन वैधानिक प्रावधानों के बावजूद बाल विवाह अब भी काफी पैमाने पर होता है और इन प्रावधानों का उल्लंघन कर हुए विवाह बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 1929 के पुराने कानून हिन्दू विवाह अधिनियम और मुस्लिम कानून में भी न तो शून्य हैं और न ही शून्य योग्य।
बच्चों के पुनर्वास और युवा महिलाओं तथा बच्चों के अनाथ नहीं छूट पाने को सुनिश्चित करने के लिए आयोग ने सिफारिश की है कि गुजारे और देखरेख की जिम्मेदारी से जुड़े प्रावधान दोनों शून्य और शून्य योग्य विवाहों पर लागू होना चाहिए।
|