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भारत का पड़ोस और 2007
-अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
2007 का अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम हॉलीवुड के कल्पना‍ चित्रों की तरह बीता। यह कहना गलत नहीं होगा की आधु‍निक युग में भी हमने मध्ययुगीन मानसिकता को देखा और भोगा।

भारत के पड़ोसी देशों पाकिस्तान, म्यांमार, नेपाल आदि में जहाँ हमने सत्ता का तानाशाही खेल देखा वहीं अफगानिस्तान और इराक में इस्लामिक तथा अमेरिकी बर्बरता के चलते मानवता के दरबदर होने पर आँसू भी बहाए। इस सबके अलावा वर्ष का खूनी अंत हुआ पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या से। यह भारत के पड़ोस में घटा सबसे भयानक घटनाक्रम था जो भारत को इंदिरा और राजीव गाँधी की यादों में खींच कर ले गया।

इस सबके बीच बांग्लादेश में 'सिद्र' के कहर ने 'ग्लोबल वर्मिंग' के परिणामों से अवगत कराया। समूचे विश्व में जलवायु परिवर्तन ने विकसित और विकासशील राष्ट्रों के बीच तनातनी खड़ी कर दी इससे ग्लोबल वार्मिंग को लेकर जिनेवा में हुई बैठक असफल ही समझी जाएगी।

पाकिस्तान मेउथल-पुथल : हम बात की शुरुआत पाकिस्तान से करते है। सैन्य राष्ट्रपति से नागरिक राष्ट्रपति बने परवेज मुशर्रफ का यह वर्ष स्वयं को क्रमश: लोकप्रिय नेता के रूप में सिद्ध करने का असफल प्रयास वाला रहा। इस दरमियान उन्होंने जहाँ एक ओर कश्मीर और अफगानिस्तान में आग लगाने का प्रयास किया, वहीं लाल मस्जिद में 100 से ज्यादा इस्लामिक कट्टरपंथियों को मारकर खुद के घर में लगी आग को बुझाने का प्रयास किया। एक दूसरे प्रयास में उन्होंने अपने देश की न्यायपालिका तक को भी नहीं बख्शा।

चौधरी इफ्तिखार खान को जब बर्खास्त किया गया तब मुशर्रफ को इस बात का इल्म नहीं था कि इस प्रयास से वह खुद कटघरे में खड़े हो जाएँगे इसलिए ताबड़तोड़ उन्हें पुन: बहाल किया गया। बाद में नवाज शरीफ को बेरंग लौटाकर और मुश्किलें खड़ी कर लीं। फिर आईं बेनजीर, जिनका स्वागत कराची में बम विस्फट से हुआ जिसमें वह बाल-बाल बच गई थी तब बेनजीर को भी समझ में आ गया कि मुशर्रफ से हाथ मिलाना और कट्टरपंथियों के खिलाफ बोलना कितना खतरनाक है।

धीरे-धीरे वह अपने बयान बदलने लगी तब मुशर्रफ को समझ आया की अब मेरे साथ कोई नहीं है तो उन्होंने आपातकाल की घोषणा कर दी। इस दौर में उन्होंने अपनी भूमिका सोच ली और चुनाव की घोषणा करते हुए स्वयं को नागरिक राष्ट्रपति बनाते हुए वर्दी छोड़ दी।

बाद इसके बेनजीर ने स्वयं पर हुए पहले हमले को शायद गंभीरता से नहीं लिया और 27 दिसंबर 2007 पाकिस्तान के इतिहास में बेनजीर के खून से लिखा गया वह काला पन्ना जिसे तारीखें कभी नहीं भूला पाएगी।

पाक में पूरे वर्ष भर चले खूनी खेल के बाद अब देखना है कि 2008 में मुशर्रफ और कट्टरपंथी क्या खेल खेलते हैं। निश्चत ही यह कहना गलत नहीं होगा कि पाकिस्तना चला तालिबान के रास्ते पर।

ईरान-उत्तर कोरिया : अमेरिका के लिए आतंक की धुरी उत्तर कोरिया और ईरान पूरे वर्ष भर सिरदर्द का केंद्र बना रहा। इसके लिए उसने दोनों देशों को तरह-तरह से धमकाने का प्रयास किया, लेकिन दोनों देशों ने अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखा, क्योंकि वह जानते थे कि रूस और चीन का समर्थन दोनों देशों के खिलाफ 'वीटो' को बेअसर करता है।

अफगानिस्तान-इराक : इन दोनों देशों पर अमेरिका के गुस्से की गाज जबसे गिरी है, तब से ही वहाँ पर जनता दरबदर है। अफगान और इराक को एक मुल्क की तरह फिर से खड़ा किए जाने के प्रयास में नाटो सेना अल कायदा और तालिबान के आगे जब विफल होते हुए दिखने लगी तो दोनों ही देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पूरे वर्ष यह डर सताने लगा कि कहीं सेना हमें छोड़कर नहीं चली जाए। लेकिन उन्हें क्या मालूम की नाटो के लिए पाकिस्तान की स्वात घाटी और इराक के आतंकी संगठन 'ब्रेन हैमरेज' का कारण बनते जा रहे हैं।

बांग्लादेश-नेपाल : यह दोनों देश पूरे वर्ष भर सत्ता के संघर्ष में लगे रहे। जहाँ नेपाल में माओवादियों के समक्ष राजा सहित पूरा राजनीति तंत्र झुक गया वहीं बांग्लादेश में शेख हसीना और खालिदा जिया की लड़ाई के चलते इस्लामिक कट्टरपंथ ने अपनी जड़ें जमाना शुरू कर दी।

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था आम तौर पर बाढ़ में डूब जाती है, उस पर इस बार 'सिद्र' तूफान ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। जहाँ सौ से ज्यादा लोग की बलि चढ़ गए, वहीं लाखों बेघर हो गए। दूसरी ओर नेपाल में 200 से ज्यादा साल पूरानी राजशाही को पूरी तरह से खत्म किए जाने की कवायद तेज हो गई है।

श्रीलंका-म्यांमार : जहाँ श्रीलंका ने लिट्टे को मिटाने की ठान ली है और इसी के तहत उन्होंने लगभग जाफना पर दबाव बना ही दिया है वहीं म्यांमार की सैन्य सरकार ने लोकतांत्रिक मंसूबों को फिर से बूटों तले कुचलने के लिए अभियान छेड़ रखा है। कई बौद्ध मठों को बंद कर भिक्षुओं को जेलों में बंद कर दिया गया है और आन सान सू की को जेल ही में नई तरह की पाबंदियों का समाना करना पड़ रहा हैं।

दोनों ही देश अपने-अपने घर के घरेलू झगड़ों में उलझे हुए हैं। भारत में शरणार्थियों का जीवन बिता रहे तमिलों के लिए वर्ष के अंत में यह खुशखबरी है कि उन्हें श्रीलंका ने फिर से अपने देश में बसाने के लिए आश्वासन दिया है।

इस सबसे भारत को एक सबक तो मिलता ही है कि 'लोकतंत्र' के क्या मायने हैं, और यह भी कि विपक्षियों को हर वक्त दुश्मन समझते रहने से सत्ता के लिए जो लड़ाई चलती है वह अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे राष्ट्र निर्मित करती है।
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