देश में अनैतिक देह व्यापार निवारण कानून (आईटीपीए) में प्रस्तावित संशोधन के कुछ हिस्सों पर यौनकर्मियों और उनके कल्याण से जुड़े संगठनों ने सवालिया निशान खड़ा करते हुए कहा है कि इससे उनका धंधा चौपट हो जाएगा।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों के यौनकर्मियों और उनके संगठनों ने प्रस्तावित संशोधन कानून की धारा 5 (सी) पर ऐतराज जताते हुए इससे उनके समक्ष आजीविका की समस्या खड़ी हो जाने की आशंका जताई है।
यौनकर्मियों का मानना है कि इस संशोधन के साथ ही यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए चकलाघरों तक पहुँचने वाले व्यक्तियों पर पुलिसिया जोर-जुल्म बढ़ जाएगा।
सशोधित कानून के तहत अब उन व्यक्तियों को भी पुलिस गिरफ्त में लिया जा सकेगा, जो यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए चकलाघरों का रुख करेंगे। इससे पहले वैश्याओं के पास जाने वाले पुरुषों को पुलिस गिरफ्तार नहीं करती थी। फिलहाल पुरुषों को अनैतिक देह व्यापार निवारण कानून 1956 के तहत तभी गिरफ्तार किया जाता है, जब वे सार्वजनिक स्थलों पर यौन संबंध बना रहे हों।
यौनकर्मियों के कल्याण में जुटे गैर सरकारी संगठन भारतीय पतिता उद्धार सभा (बीपीयूएस) नाज फाउंडेशन, कोलकाता की संस्था दरबार महिला समन्वय समिति और अशोदया समिति जैसे तमाम संगठनों ने प्रस्तावित संशोधन कानून की धारा 5 (सी) का पुरजोर विरोध किया है। उनका मानना है कि इससे वैश्यालयों में पहुँचने वाले ग्राहकों की संख्या में कमी आएगी। साथ ही पुलिस के लिए वह दोहरी कमाई का जरिया बन जाएगा।
बीपीयूएस के संस्थापक अध्यक्ष खैरातीलाल भोला का मानना है कि चकलाघरों में अब तक पुलिस वाले केवल यौनकर्मियों से धन उगाही करते हैं, लेकिन प्रस्तावित कानून पर अमल होने के साथ ही पुलिसकर्मी ग्राहकों से भी मोटी कमाई करेंगे, जिससे देश के सैकड़ों रेड लाइट क्षेत्रों में ग्राहकों का आना-जाना धीरे-धीरे कम हो जाएगा। उससे कम से कम बीस लाख यौनकर्मियों के समक्ष आजीविका की समस्या पैदा हो जाएगी।
यौनकर्मियों और किन्नरों के कल्याण में पिछले 40 वर्षों से जुटे भोला के अनुसार यौनकर्मियों की आजीविका छीनने का सरकारी प्रयास सर्वथा अनुचित है। उनका मानना है कि सर्वप्रथम यौनकर्मियों के पुनर्वास की ओर सरकार को ध्यान देना चाहिए।
भारत के अलावा स्वीडन ही दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है, जहाँ 1999 में ऐसा कानून बनाया गया, जिसके तहत वैश्यालयों में जाने वाले पुरुषों को भी गिरफ्तार कर अभियोग चलाए जाने का प्रावधान है। हालाँकि इस कानून से वैश्यावृत्ति में कमी भले ही आई हो, लेकिन स्वीडन से वैश्यावृत्ति का सफाया नहीं हो सका है।
इसमें कोई संशय नहीं कि स्वीडन में इस कानून के कारण बहुत ही कम मामलों में अभियुक्त को सजा हो पाती है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि ज्यादातर यौनकर्मी अपने ग्राहकों के खिलाफ बयान देने के लिए अदालत जाने से गुरेज करती हैं। अपने यहाँ प्रस्तावित संशोधित कानून को लेकर गैर सरकारी संगठनों के विरोध का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नाज फाउंडेशन की अंजलि गोपालन ने इस कानून के विरोध में अनन्या पुरस्कार लौटा दिया था।
गोपालन को महिलाओं और बच्चों के पुनर्वास के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर अनन्या पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। प्रस्तावित संशोधित कानून का विरोध करने के लिए देश के विभिन्न राज्यों से यौनकर्मियों का राजधानी में एकत्रित होना जारी है।
प्रस्तावित कानून की धारा 5 (बी) को भी संशोधित किया गया है, जिसके तहत व्यक्तिगत तौर पर अनैतिक देह व्यापार में शामिल किसी भी व्यक्ति को पहली बार न्यूनतम सात वर्ष और नाबालिग बच्चों के अनैतिक देह व्यापार के आरोप में न्यूनतम दस वर्ष बामशक्कत कारावास की सजा का प्रावधान किया गया है, जबकि इस तरह के दूसरे और तीसरे अपराध के लिए आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान किया गया है।
आईटीपीए की धारा आठ के दुरुपयोग को देखते हुए प्रस्तावित संशोधन इसे हटाए जाने का प्रावधान किया गया है। नए कानून के उपखंड में इस बात का जिक्र किया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि धारा 8 को समाप्त करने के सरकार के फैसले का विभिन्न संगठनों ने स्वागत किया है।
सरकार ने देह व्यापार में लिप्त महिलाओं को दलालों, एजेंटों और धोखेबाजों द्वारा दबाव और धमकी देकर गुमराह किए जाने की घटनाओं पर विराम लगाने के उद्देश्य से धारा 8 को समाप्त करने का फैसला किया है।
धारा 8 के हट जाने से पुलिस अब यौनकर्मियों को पकड़कर थाने नहीं ले जा सकेगी। ज्यादातर महिलाओं का इसी धारा के तहत चालान किया जाता था। प्रस्तावित कानून के लागू हो जाने के बाद छोटे स्थानों पर या गली मोहल्लों में व्यक्तिगत तौर पर अनैतिक देह व्यापार में लिप्त महिलाएँ भी नहीं बच पाएँगी। उन्हें भी इस कानून का खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
हालाँकि इसमें कोई संदेह नहीं कि सरकार ने अनैतिक देह व्यापार से संबंधित मौजूदा कानून की कुछ धाराओं में संशोधन कर और कुछ नई धाराएँ जोड़कर इसे सख्त बनाने का फैसला किया है।
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