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लालाजी की मौत का बदला
क्रांतिकारियों ने सांडर्स को मार गिराया था
यह उन दिनों की बात है, जब देश में स्वतंत्रता संग्राम का जोर था। आजादी के दीवाने भारत माता की बेड़ियाँ काटने की जिद ठाने थे और अंग्रेजी हुकूमत उनके दमन पर आमादा थी।

साइमन कमीशन का विरोध करने पर ब्रिटिश पुलिस ने लाला लाजपत राय की हत्या कर दी, तो क्रांतिकारियों ने सांडर्स को मारकर न सिर्फ लालाजी की मौत का बदला लिया, बल्कि ब्रिटिश शासन की चूलें हिला दीं।

सन 1927 में जब सारे देश में गोरी हुकूमत के खिलाफ भारतीय जनता एक साथ उठ खड़ी हुई थी, ब्रिटिश सरकार ने 1919 के इंडिया एक्ट के कामकाज की समीक्षा के नाम पर भारतीयों का भविष्य तय करने के लिए साइमन कमीशन के गठन की घोषणा की।

कमीशन का अध्यक्ष सर जोन साइमन था और इसके सभी सदस्य अंग्रेज थे, जो भारतीयों का बहुत बड़ा अपमान था। सरकार ने स्वराज की माँग पर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिसके चलते पूरे देश में आग भड़क उठी।

चौरीचौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस लिए जाने के बाद आजादी की लड़ाई में जो ठहराव आ गया था, वह अब साइमन कमीशन के गठन की घोषणा से टूट गया। हजारों युवाओं में क्रांति की उमंगें उमड़ने लगीं और इस तरह साइमन कमीशन खुद ब्रिटिश सरकार के लिए ही जी का जंजाल बन गया।

1927 में मद्रास में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जिसमें सर्वसम्मति से साइमन कमीशन के बहिष्कार का फैसला लिया गया। मुस्लिम लीग ने भी साइमन के बहिष्कार का फैसला किया।

तीन फरवरी 1928 को कमीशन भारत पहुँचा और इसके अध्यक्ष सर जोन साइमन सहित अन्य सदस्य मुम्बई में उतरे। साइमन कोलकाता, लाहौर, लखनऊ, विजयवाड़ा और पुणे सहित जहाँ-जहाँ भी पहुँचा उसे जबर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ा और लोगों ने उसे काले झंडे दिखाए।

हालात बिगड़ते देख केंद्रीय विधानसभा ने भी फैसला लिया कि वह साइमन को कोई सहयोग नहीं देगी। जबर्दस्त विरोध के चलते ब्रितानिया हुकूमत गुस्से से तिलमिला उठी। मद्रास में प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ बरसाई गईं और अन्य जगहों पर लाठीचार्ज किया गया।

पूरे देश में साइमन गो बैक (साइमन वापस जाओ) के नारे गूँजने लगे। लखनऊ में हुए लाठीचार्ज में पंडित जवाहरलाल नेहरू घायल हो गए और गोविंदवल्लभ पंत अपंग।

लाहौर में बड़ी घटना घटी। 30 अक्टूबर 1928 को लाला लाजपत राय के नेतृत्व में साइमन का विरोध कर रहे युवाओं को बेरहमी से पीटा गया। पुलिस ने लाला लाजपत राय की छाती पर निर्ममता से लाठियाँ बरसाईं। वे बुरी तरह घायल हो गए और अंतत: इस कारण 17 नवम्बर 1928 को उनकी मौत हो गई।

लालाजी की मौत से सारा देश उत्तेजित हो उठा और चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव व अन्य क्रांतिकारियों ने लालाजी की मौत का बदला लेने की ठानी।

इन जाँबाज देशभक्तों ने लालाजी की मौत के ठीक एक महीने बाद अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली और 17 दिसंबर 1928 को ब्रिटिश पुलिस के अफसर सांडर्स को गोली से उड़ा दिया।

इसी जुर्म में गोरी सरकार ने राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह को फाँसी की सजा सुनाई और इन देशभक्तों ने 23 मार्च 1931 को हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूम लिया।
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