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कस्तूरबा गाँधी भी आहत थीं हरिलाल से
अपने बड़े बेटे हरिलाल के इस्लाम धर्म कबूल करने से न केवल महात्मा गाँधी, बल्कि उनकी पत्नी कस्तूरबा गाँधी भी बेहद आहत थीं और उन्होंने इस संबंध में अपने इस पुत्र के साथ ही उसके मुस्लिम दोस्तों को भी पत्र लिखा था। इन पत्रों में न केवल एक माँ की ममता की बेबसी झलकती है, बल्कि यह भी पता चलता है कि वह धार्मिक रूप से किस कदर सहिष्णु थीं।

बा ने 27 सितंबर 1936 को हरिलाल को लिखे एक पत्र में इस बात पर हैरानी जताई थी कि उसने अपना प्राचीन धर्म क्यों बदल लिया। वह इस बात को सोच-सोचकर भी बेहद दु:खी होती थीं कि हरिलाल ने धर्म परिवर्तन के बाद माँस का सेवन शुरू कर दिया होगा।

उन्होंने पत्र में लिखा था मुझे कई बार हैरानी होती है कि तुम कहाँ रहते, कहाँ सोते हो और क्या खाते हो। हो सकता है कि तुम माँस खाते हो। ऐसी ही अनगिनत बातों ने मेरी रातों की नींद उड़ा दी है।

इन दिनों सुर्खियों में छाई फिल्म 'गाँधी माई फादर' में महात्मा गाँधी और हरिलाल के संबंधों को चित्रित किया गया है, लेकिन फिल्म में इन पत्रों का जिक्र नहीं है, जो बा के व्यथित मन में झाँकने का मौका देते हैं।

बा धार्मिक रूप से सहिष्णु थीं, उसका पता भी इस पत्र से चलता है, जिसमें उन्होंने हरिलाल से कहा था यह तुम्हारा मामला है, लेकिन मैंने सुना है कि तुम भोले-भाले लोगों से अपना अनुकरण करने को कह रहे हो। तुम धर्म के बारे में क्या जानते हो। तुम अपनी सीमाओं को क्यों नहीं समझ रहे हो।

बा इस बात से भी बेहद दु:खी थीं कि हरिलाल के कारण उनके पति की छवि प्रभावित हो रही है। उन्होंने पत्र में कहा भी था कि लोग इस बात से प्रभावित होते हैं कि तुम अपने पिता के पुत्र हो। मैं तुमसे विनती करती हूँ कि जिंदगी में कुछ क्षण ठहरकर इन सब चीजों पर विचार करो और मूर्खतापूर्ण हरकतें बंद करो।

इस पत्र में उन्होंने हरिलाल को फटकार लगाते हुए कहा था कि धर्म के बारे में तुम क्या जानते हो। धर्म का प्रचार करने के लिए तुम उपयुक्त नहीं हो। यदि तुमने इसी प्रकार काम जारी रखा तो एक दिन ऐसा आएगा कि तुम कहीं के नहीं रहोगे।

बा जाहिर तौर पर हरिलाल के धर्मातरण से खुश नहीं थीं। उन्होंने लिखा था कि मैं तुम्हारे धर्मांतरण को पसंद नहीं करती थी, लेकिन जब मैंने तुम्हारे बयान पढ़े कि तुमने खुद को सुधारने का फैसला किया है तो मैं अंदर ही अंदर धर्मांतरण तक के बारे में सोचकर खुशी महसूस करती थी। यह उम्मीद करती थी कि तुम एक अच्छी जिंदगी शुरू करोगे, लेकिन ये उम्मीदें भी ध्वस्त हो गई हैं।

अपने पिता के विशाल व्यक्तित्व के विपरीत जिंदगीभर तमाम उठापटक झेलने वाले और लगभग भिखारी का-सा जीवन बिताने वाले हरिलाल के बारे में कस्तूरबा गाँधी को लगता था कि उसके मुस्लिम दोस्तों ने उसे इस्लाम ग्रहण करने के लिए प्रलोभन दिया।

बा ने हरिलाल के मुस्लिम दोस्तों को भी 27 सितंबर 1936 को एक पत्र लिखकर कहा था कि मैं तुम लोगों की कार्रवाई को समझ नहीं पा रही हूँ। मैं जानती हूँ और इस बात को सोचकर खुश हूँ कि बड़ी संख्या में विचारवान मुसलमान और हमारे लंबे समय से दोस्त रहे मुस्लिम मित्र इस पूरी घटना की निंदा कर रहे हैं।

बा को कहीं न कहीं इस बात की उम्मीद थी कि धर्मांतरण से उनके पुत्र का कुछ भला होगा, लेकिन उन्होंने इस पत्र में लिखा कि मेरे बेटे का भला होने के बजाय मैंने पाया है कि उसके तथाकथित धर्मातरण ने वास्तव में मामले को और बिगाड़ दिया है। कुछ लोग तो इस हद तक चले गए हैं कि उसे मौलवी का खिताब दे दिया जाए। क्या तुम्हारा धर्म मेरे बेटे जैसे व्यक्ति को मौलवी कहलाने की अनुमति देता है।

उन्होंने उनके मुस्लिम दोस्तों को समझाते हुए लिखा था कि तुम जो कुछ भी कर रहे हो, वह कतई उसके हित में नहीं है। यदि तुम्हारी इच्छा मुख्य रूप से हमारी हँसी उड़वाना है, तो मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना है।

बा के इस पत्र में एक माँ की ममता की बेबसी झलकती है। उन्होंने लिखा मुझे लगता है कि यह मेरा कर्त्तव्य है कि मैं तुम लोगों से भी वही बात दोहराऊँ जो मैं अपने बेटे को बता रही हूँ कि तुम भगवान की नजर में ठीक नहीं कर रहे हो।
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