मेरे पिता को फिरंगियों ने परिवार वालों के सामने गोली मार दी। विभाजन में मैंने अपना घर, अपनी संपत्ति खोई, अपनों को सीमा के उस पार छोड़ इस पार आकर लंबे समय तक खानाबदोश-सा जीवन गुजारा और 84 के दंगों में अपने पति को गँवा दिया। कम से कम मेरे लिए यह वह आजादी तो नहीं है, जिसकी हमें चाह थी।
83 बरस की हो चुकीं गुरबचन कौर की आँखें भले ही कमजोर हो गई हैं, लेकिन स्मृतियों के पन्ने जरा भी फीके नहीं पड़े। तल्ख लहजे में वे कहती हैं- गाँधी बाबा कहते थे कि हर आँख से आँसू पोंछो, लेकिन मैं तो यह सोच ही नहीं सकती कि कोई मेरी आँखों से आँसू पोंछेगा। मैं पति के साथ इस देश में रहने के लिए आई थी। मुझे पता नहीं था कि एक बार लुट चुकी मेरी दुनिया इस देश में दोबारा लूट ली जाएगी। मैं इसे वह आजादी नहीं मानती, जिसकी हमें चाह थी।
पुरानी यादों को सहेजती गुरबचन कौर कहती हैं- हम कराची के लांधी शहर के रहने वाले हैं। हमारा संयुक्त परिवार था। मेरे पिता रोज गुरुद्वारे जाते थे। फिरंगियों को शक हुआ कि मेरे पिता और उनके साथी गुरूद्वारे में उन लोगों को छिपाते हैं, जो बगावत करते हैं। उन्होंने लांधी में गुरुद्वारे के बाहर गोलियाँ बरसाईं, जिसमें मेरे चाचा मारे गए। फिर सिपाही हमारे घर आए।
गुरबचन कौर को आज भी याद है वह मंजर। सिपाहियों ने पिताजी को घसीटकर दालान में निकाला और गोली मार दी। वे तड़प रहे थे और हम लोग काँपते हुए देख रहे थे। उन्होंने कुछ ही देर में दम तोड़ दिया।
वे कहती हैं कि आजादी की लड़ाई तेज हुई। फिर पता चला कि देश आजाद हो रहा है, लेकिन दो हिस्सों में बँटकर। हिंदू हिंदुस्तान में रहेंगे और मुसलमान पाकिस्तान में। मार-काट मचने लगी। हम लोग हिंदू परिवारों के साथ हिंदुस्तान चले आए। खानाबदोशों की तरह घूम-घूमकर काम करते और जैसे-तैसे गुजारा करते। उन्होंने बताया कि किसी तरह कर्ज लेकर पति ने उत्तमनगर में किराने की दुकान खोली। बहुत मुश्किल से जिंदगी पटरी पर आ रही थी कि 1984 में दंगे भड़के और रात को मेरे पति की दुकान जला दी गई। वे दुकान के अंदर सो रहे थे।
गुरबचन कहती हैं कि उनको सरकार की ओर से मुआवजा मिला, लेकिन यह रकम बहुत ही कम थी। उन्होंने खुद कभी कोई माँग नहीं की। वे कहती हैं माँगूँ उससे जो तकलीफ समझे। 1947 के पहले जब हिंसा होती थी तो पीड़ा नहीं होती थी, क्योंकि हमारी आँखों में देश की आजादी का सपना पल रहा था, लेकिन आज जब हिंसा होती है तो गहरी पीड़ा होती है, क्योंकि आजाद भारत में हम अपनों का खून बहाते हैं।
गुरबचन के भाई लुधियाना में रहते हैं। वे कहती हैं कि जब हम मिलते हैं, तो लगता है कि शायद यह आखिरी मुलाकात है। अब अपनी परछाई पर भी भरोसा नहीं होता।
यह पूछने पर कि क्या दोबारा लांधी जाना नहीं हुआ, वे कहती हैं किससे मिलने जाऊँ। जो थे, पता नहीं अब वे बचे हैं या नहीं। मकान, खेत कहाँ गए, पता नहीं। जाने का मन भी नहीं होता। यहाँ भी पति की मौत के बाद से मन नहीं लगता। मेरे बच्चे, मेरे पड़ोसी समझाते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि सब कुछ दिखावा है। पलभर में सब कुछ खत्म हो जाता है।
आजादी के 60 बरस पूरे होने पर क्या कहना चाहेंगी। वे कहती हैं सिर्फ इतना कि लोग इनसानियत का मतलब समझें। मेरे दौर की पीढ़ी तो अब खत्म हो रही है, लेकिन नई पीढ़ी को बहुत कुछ करना है, इसलिए वह हिंसा से दूर रहे। अब दोबारा देश का बँटवारा नहीं होना चाहिए। जब आत्मा का विभाजन होता है, तो असहनीय पीड़ा होती है।
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