मध्यप्रदेश के शहडोल जिले के एक पिछड़े इलाके में बगैर सिंचाई साधन के वित्ताभर खेती करने वाले खोजरामसिंह के भविष्य के बारे में यही कल्पना की जा सकती थी कि वह इन्द्रदेव के प्रसन्न होने पर अनाज के कुछ दाने पैदा करके और दूसरों के खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करके गरीबी में ही जीवन बिताएगा। लेकिन खुद खोजराम के इरादे कुछ और ही थे।
शासन की कपिलधारा योजना के तहत उसने अपने खेतों में कुआँ न खुदवाया होता तो उसकी जिंदगी में यह मोड़ नहीं आता। आज खोजराम एक लखपति किसान है। सरकारी योजनाओं की मदद और अपनी मेहनत से संपन्न हुए किसानों पर लिखी सफलताओं की गाथाओं में से एक उनकी भी है।
शहडोल जिला मुख्यालय से 35 किमी दूर स्थित एक छोटे से गाँव चटहा के रहने वाले खोजरामसिंह कहने को तो साढ़े तीन एकड़ जमीन के स्वामी थे लेकिन उनके खेतों की प्यास बुझाने को उनके पास सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं थी। हकीकत में वह दिहाड़ी मजदूर थे और दूसरों के खेतों में काम करके किसी तरह अपनी आजीविका चला रहे थे।
तभी ग्रामीण विकास विभाग ने 2007 में उन्हें अपने खेतों में कुआँ खोदने के लिए कपिलधारा योजना के तहत 67 हजार रुपए की आर्थिक मदद दी। कुएँ के भरोसे उसने बैंक से लोन लेकर मोटर पम्प भी लगवा लिया। इस कुएँ ने खोजराम का जीवन ही बदल दिया। कुएँ की मदद से पहले साल ही लगाई गई फसल ने उसे लखपति बना दिया।
उन्होंने धान, प्याज, बैगन, टमाटर, गेहूँ का भरपूर उत्पादन किया। अकेले प्याज की बिक्री से ही उसे एक लाख रुपए की आमदनी हुई। बैगन और टमाटर भी हजारों रुपए के बिके और अभी उसके खेतों से रोजाना 50 किलो बैगन निकल रहा है। उनके खेतों से करीब साठ हजार रुपए की लौकी का उत्पादन होने का अनुमान है। कभी जो हाथ काम माँगने को उठते थे वही आज दूसरों को काम दे रहे हैं। |