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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह साफ कर दिया है कि कश्मीर में सीमाओं का फिर से रेखांकन नहीं किया जा सकता, जिसके बाद पाकिस्तान की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई और उसने कहा कि ‘विवाद’ का निपटारा संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों की तर्ज पर होना चाहिए।

सिंह ने कहा कि मैंने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि जम्मू-कश्मीर में सीमाओं का दोबारा रेखांकन नहीं हो सकता। उन्होंने ‘सीएनएन’ को दिए साक्षात्कार में कहा कि लेकिन दोनों देश यह सुनिश्चित कराने के लिए एक साथ काम कर सकते हैं कि ये सीमाएँ शांतिपूर्ण हों और इसमें लोगों के बीच परस्पर संपर्क इस तरह विकसित हो, जिससे लोग इस बारे में भी चिंता न करें कि वे सीमा के इस पार हैं या उस पार।

सिंह से यह पूछा गया था कि क्या वे पाकिस्तान के साथ रचनात्मक बातचीत की कोई संभावना देखते हैं क्योंकि वे पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के पद छोड़ने से पहले उनके साथ किसी तरह के समझौते के कुछ करीब थे। इसके जवाब में प्रधानमंत्री ने कहा कि अगर मुक्त कारोबार हो, लोगों के बीच परस्पर संपर्क हो और दोनों देश दोनों तरफ के लोगों को गरिमापूर्ण तथा आत्मसम्मान के साथ जीने में मदद करने के लिए आपसी प्रतिस्पर्धा करें तो ऐसा हो सकता है। ये मुद्दे हैं जिन पर हम चर्चा कर सकते हैं और किसी समझौते पर पहुँच सकते हैं।

उधर, इस्लामाबाद में पाकिस्तान के विदेश विभाग के प्रवक्ता अब्दुल बासित ने कहा कि जम्मू-कश्मीर विवादित क्षेत्र है, जिसे संयुक्त राष्ट्र के प्रासंगिक प्रस्तावों तथा जम्मू कश्मीर की जनाकांक्षाओं के अनुरूप हल होने का इंतजार है।

बासित ने कहा कि भारत विवाद से जुड़े पक्षों में से एक है। लिहाजा, वह विवाद के दर्जे में एकतरफा बदलाव नहीं कर सकता या कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार से साफ तौर पर विपरीत पूर्व शर्तें नहीं रख सकता।

भारत इस रूख पर बरकरार है कि पूरा जम्मू-कश्मीर देश का अभिन्न अंग है जिसमें वे क्षेत्र भी शामिल हैं जिन पर पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्जा कर रखा है।

मौजूदा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी नीत सरकार ने समान तरह का रुख अपनाया, लेकिन गत वर्ष मुंबई में आतंकवादी हमले के मद्देनजर भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में तल्खी आने के बाद उसने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के कार्यान्वयन पर जोर देना शुरू कर दिया।
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