-वेबदुनिया डेस्क ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपनी खोजों से निष्कर्ष निकाला है कि रोशनी की मौजूदगी और गैर मौजूदगी से किसी भी व्यक्ति के नींद में होने या पूरी तरह से सतर्क होने के स्तरों का निर्धारण होता है। चूहों पर किए गए परीक्षणों से यह बात सामने आई है कि नींद में होना और जागरूकता हमारी आँखों के अंदर रेटिना में पाए जाने वाली गैंगलियन कोशिकाओं पर निर्भर करती है।
चूँकि चूहे रात में सक्रिय होने वाले प्राणी हैं, इसलिए मनुष्यों की तुलना में रोशनी का उनके ऊपर प्रभाव उलटा पड़ता है। वैज्ञानिकों ने अंधेरे में चार घंटों तक चूहों की वीडियोग्राफी की और उनकी माँसपेशियों और मस्तिष्क की गतिविधियों का अध्ययन किया। इसके बाद एक घंटे के लिए लाइट जला दी गई। लाइट जलने के 15-20 मिनट बाद चूहे सो गए।
रोशनी के प्रति संवेदनशील गैंगलियान कोशिकाओं के व्यवहार में एकाएक बदलाव आया था, लेकिन जब तक रोशनी जलती रही तब तक चूहे भी सोते रहे। जबकि कमरों में अगर बहुत हल्की रोशनी होती है तो लोगों को नींद आने लगती है और तेज रोशनी होने पर वे जागते रहते हैं।
शोधकर्ताओं का नेतृत्व करने वाले प्रो. रसेल जी. फॉस्टर ने यह भी पता किया कि मस्तिष्क में नींद लाने वाले दो केन्द्र इन कोशिकाओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय किए जाते हैं। इसलिए चूहों की तुलना में मनुष्यों के इम्यून सिस्टम्स, कॉग्निटिव परफॉर्मेंस और मेंटल हैल्थ का शरीर के नींद और जागृति चक्र से प्रभावित होते रहते हैं।
|