संयुक्त राष्ट्र के मौसम बदलाव विभाग के प्रमुख राजेंद्र पचौरी ने कहा है कि वर्तमान समय में जारी वार्ता इसी गति से जारी रही तो वर्ष 2009 तक विश्व के प्रमुख देशों के बीच मौसम बदलाव समझौता संभव हो सकता है।
विश्व के प्रमुख देशों के अगले वर्ष के अंत तक क्योटो संधि के लिए एक नई संधि तैयार करने पर सहमति जताने के बाद संयुक्त राष्ट्र ने गत मार्च में बातचीत शुरू की।
पचौरी ने आयोजित एशियाई विकास बैंक की वार्षिक बैठक में कहा कि यदि बातचीत इसी गति से जारी रही तो हम एक ऐसा समझौता कर पाएँगे जो कि हमारे आपसी सहमति पर आधारित होगा।
उन्होंने कहा कि पिछले एक वर्ष में ग्लोबल वार्मिंग के संबंध में व्यापक जागरूकता का निर्माण हुआ, जिसके कारण अमेरिका जैसे विकसित देशों पर भी इस संबंध में कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यदि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को वर्ष 2015 तक कम करने के साथ ही इसे वर्ष 2050 तक आधा नहीं किया तो आने वाले समय में विश्व में और अधिक सूखा पड़ने के साथ ही गर्मी और बढे़गी और समुद्र का जलस्तर बढ़ने से समुद्र किनारे के क्षेत्र समुद्र में समा जाएँगे।
संयुक्त राष्ट्र को इस बात का भरोसा है कि सभी देश क्योटो संधि से आगे जाकर ग्रीन हाउस गैसों के उर्त्सन पर रोक लगाने पर सहमत होंगे जो कि ग्लोबल वार्मिंग का प्रमुख हिस्सा है।
क्योटो संधि के तहत 37 अमीर देशों ने ही ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर कटौती करने पर सहमति व्यक्त की है, जबकि सबसे अधिक ग्रीन हाउस का उत्सर्जन करने वाले अमेरिका ने इस समझौते में शामिल होने से इनकार कर दिया है।
इस संबंध में अगली बैठक इस वर्ष जून में जर्मनी में आयोजित होगी। इस बैठक में मौसम बदलाव से निपटने के लिए तकनीक के लिए राशि जुटाने पर बातचीत होगी।
विकासशील देशों की माँग है कि विकसित देशों को इस राशि के एक बडे़ हिस्से का भुगतान करना चाहिए, क्योंकि उनके द्वारा सबसे अधिक मात्रा में ग्रीन हाउस गैसों का उर्त्सजन होता है।
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