माताएँ भले ही बच्चों को लाड़-प्यार तथा दुलार करने में कोई कसर नहीं रखती हों पर उनके बच्चे व्यावहारिक बनें तथा शिष्टाचारी हो इसके लिए भी अलग भूमिका अदा करना चाहती हैं। यह निष्कर्ष निकला है कि ब्रिटेन में किए गए एक सर्वे से। इससे पता चलता है कि माताएँ बच्चों को अपने दादा-दादियों से प्राप्त मूल्य देना चाहती हैं।
वास्तव में इस सर्वे के अनुसार माताएँ इस मामले के प्रति बहुत सावधान है कि उनके बच्चे कृपया तथा धन्यवाद आदि का शब्दों का प्रयोग करें। द डेली टेलीग्राफ में छपी खबर के मुताबिक माताएँ अपने बच्चों को सच बोलने के लिए प्रोत्साहित करना बड़ों के लिए सीट छोड़ना तथा टेबल पर बैठने के तौर तरीके सिखाना चाहती हैं। मार्क तथा स्पेंसर ने अपने सर्वे में 1084 से अधिक महिलाओं की मातृत्व मनोवृत्तियों का अध्ययन किया।
इसमें से तीन चौथाई माताओं का मानना था कि तीन साल की उम्र ही बच्चों को आचार व्यवहार सिखाने की सही आयु होती है। एक तिहाई महिलाओं का मानना था कि वे तीन से पाँच साल की उम्र में बच्चों को मूल्यों की कीमत तथा बचत की आदत के बारे में सीख देना प्रारंभ कर देती हैं। इन बच्चों को प्रोत्साहन दिया जाता है कि वे गुल्लक में पैसे जमा करें बचत खाता खोलें तथा बागवानी जैसे छोटे मोटे काम करके पॉकेट मनी कमाएँ।
सर्वे में यह पाया गया है कि माताएं अपने बच्चों को उनकी पसंद तथा ना पसंद भी जाहिर करने को प्रोत्साहित करना सिखाती हैं। इससे बच्चे अपने दोस्तों तथा भाई बहनों के साथ तारतम्य स्थापित करने में सक्षम में होंगे।
इससे जाहिर हुआ कि जीवन में महिलाएं अपनी पारंपरिक भूमिका से हटकर अनुशासित रखने की भूमिका में आ गयी हैं। पूछे गये आधे से अधिक प्रश्नों से पता चला कि माताएं घरेलू नियमों को लागू करने में अग्रणी भूमिका अदा करना चाहती हैं।
व्यवहार मनोवैज्ञानिक डोना डासन का सर्वे पर कहना था कि इस शोध से यह बात जाहिर होती है कि माताएं 1950 के दशक की तरह भूमिकाओं में फिर से आना चाहती हैं। उस समय में अच्छा व्यवहार सिखाने तथा दूसरों का आदर करने का प्राधिकार एक महत्वपूर्ण मुददा समझा जाता था।
|