ब्रिटेन में गुरुवार को स्थानीय निकाय के चुनाव होने जा रहे हैं और इसी बीच एक नए शोध से पता चला है कि ब्रिटेन में भी चुनावी व्यवस्था एशियाई शैली की 'धाँधली' की शिकार हो रही है, जिसमें भारतीय उप महाद्वीपीय मूल के समुदायों की मुख्य भूमिका बताई जाती है।
दुनिया में विभिन्न समुदायों द्वारा अपनी संस्कृति से एक दूसरे समुदायों को प्रभावित करने की परंपरा तो काफी पुरानी रही है, लेकिन किसी देश की चुनावी व्यवस्था में दूसरे देश की बुराइयाँ आना काफी हास्यास्पद और रोचक विषय है।
ब्रिटेन के कई निर्वाचन क्षेत्रों में एशियाई समुदाय के लोग वोट प्रतिशत का एक बड़ा हिस्सा हैं लेकिन इन लोगों की गाँव की राजनीति और बिरादरी प्रणाली के अनुसार पोस्टल बैलेट के जरिए थोक के भाव मतदान करने के रिवाज ने चुनाव अधिकारियों को चिंता में डाल दिया है।
जोसफ रोवेट्री रिफोर्म ट्रस्ट द्वारा कराए गए शोध से पता चलता है कि वर्ष 2000 से ही चुनाव में विभिन्न प्रकार की धांधलियाँ अपनाई गई। इस प्रकार के मामले बर्मिंघम ओल्डहैम, ब्लैकबर्न बर्नले और लंदन के टॉवर हेमलेट्स में दिखाई दिए जहाँ एशियाई बड़ी सँख्या में निवास करते हैं।
शोध कराने वाले ट्रस्ट ने कहा है कि एशियाई आबादी वाले इलाकों में चुनावों में पाकिस्तानी कश्मीरी और बांग्लादेशी बिरादरी के नाम पर बहुसँख्यक वोटों को प्रभावित किया जाता है।
'ब्रिटेन में चुनाव की शुचिता चिंता का विषय' शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है यह स्पष्ट है कि प्रत्येक प्रमुख राजनीतिक दल ने किसी न किसी चरण में किसी समुदाय विशेष में मुस्लिम उम्मीदवार के जरिए एक व्यापक आबादी का वोट हासिल करने की गारंटी की चाह में राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया।
इस रिपोर्ट में बर्मिंघम की पार्षद सलमा याकूब का हवाला दिया गया है, जिन्होंने चेतावनी दी है कि मुस्लिम महिलाएँ अपना मताधिकार खो सकती हैं। याकूब कहती हैं इसका कारण यह है कि बिरादरी नेटवर्क अनावश्यक दबाव डाल सकता है और इसी कारण हम डाक के जरिए मतदान के खिलाफ बर्मिंघम में व्यापक पैमाने पर प्रचार कर रहे हैं।
डाक के जरिए भेजे जाने वाले मतपत्र में भी गोपनीयता होनी चाहिए लेकिन जब परिवार के सदस्य उम्मीदवार या समर्थक आपके मतपत्र भरने को प्रभावित करते हैं तो यह गोपनीयता समाप्त हो जाती है। वह कहती हैं कि केवल मतदान केन्द्रों पर ही मत डालने की व्यवस्था होनी चाहिए।
रिपोर्ट कहती है कि पोस्टल वोट को अनुमति देकर मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के सरकार के प्रयास बिना किसी शंका के चुनावी प्रणाली में जनता का विश्वास घटाने वाले साबित हुए हैं।
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