जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र पेनल के प्रमुख राजेन्द्र पचौरी ने कहा है कि धनी देश कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में कोई स्पष्ट उदाहरण पेश करने में विफल रहे हैं और इसी के चलते भारत तथा चीन समेत विकासशील देश क्योटो संधि के स्थान पर नई संधि पर हस्ताक्षर करने के इच्छुक नहीं हैं।
जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारीय पेनल (आईपीसीसी) के प्रमुख राजेन्द्र पचौरी ने कहा कि अमेरिका समेत धनी देश ऐसे कदम उठाने में विफल रहे हैं जो विकासशील देशों को कोपेनहेगन में अगले साल संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए सहमत कर सकें।
'दी गार्जियन' ने पचौरी के हवाले से लिखा है- हो सकता है कि आप एक ही बार में किसी समझौते पर नहीं पहुँच सकें। कोपेनहेगन को ही लें तो ये किसी दीर्घकालिक मकसद के संबंध में स्थिरीकरण का रास्ता प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक स्थिति देखें तो मुझे इस बात में संदेह है कि कोई भी विकासशील देश विकसित देशों द्वारा उदाहरण पेश किए बिना किसी प्रकार की प्रतिबद्धता में बँधने के लिए राजी होंगे।
ऊर्जा तथा संसाधन संस्थान नई दिल्ली के महानिदेशक पचौरी ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि वे (चीन और भारत) पहले दौर में राजी होंगे।
पचौरी ने कहा कि मुझे लगता है कि चीन और भारत जैसे देश स्वैच्छिक रूप से इस दिशा में कुछ कदम बढ़ाने से पूर्व विकसित देशों द्वारा किए जाने वाले प्रयासों को देखना चाहेंगे। उन्होंने कहा कि जर्मनी इस संबंध में एक सकारात्मक उदाहरण पेश कर रहा है और ब्रिटेन भी काफी सही कर रहा है लेकिन कई विकसित देशों द्वारा कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने में विफल रहने से निराशा के कुछ कारणों अभी भी हैं।
अर्थशास्त्री तथा पर्यावरण वैज्ञानिक पचौरी ने पिछले साल आईपीसीसी की ओर से नोबेल शांति पुरस्कार हासिल किया था जो संयुक्त रूप से पूर्व अमेरिकी उपराष्ट्रपति अल गोर को दिया गया था।
उन्होंने कहा कि अगले साल की संधि पर हस्ताक्षर के मकसद से चीन और भारत को मनाने के लिए विकसित देशों के पास अभी भी समय है लेकिन इसके लिए अगले कुछ माह में कई कदम उठाने की जरूरत होगी।
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