अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वाच ने भारत सरकार से अपील की है कि वह नक्सली हिंसा से सुरक्षा की उम्मीद में छत्तीसगढ़ से आंध्रप्रदेश में जा बसे हजारों लोगों को उनकी बस्तियों से कथित रूप से जबरन निकाले जाने और अन्य जगहों पर बसाए जाने पर रोक लगाए।
ह्यूमन राइट्स वाच (एचआरडब्ल्यू) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि आंध्रप्रदेश के वन विभाग ने पाँच अप्रैल को कोथुरू गाँव में रहने वाले निवासियों को इलाके से जबरन निकालने के लिए उनके घरों को नष्ट कर दिया। ये लोग नक्सली हिंसा से सुरक्षा की उम्मीद में यहाँ रह रहे हैं।
संगठन ने कहा है कि जनवरी 2007 के बाद से आंध्रप्रदेश का वन विभाग कोथुरू से लोगों को जबरन निकालने के लिए करीब दस प्रयास कर चुका है।
एचआरडब्ल्यू के दक्षिण एशिया की वरिष्ठ शोधकर्ता मीनाक्षी गांगुली ने बताया कि हजारों पुरुष-महिलाएँ तथा बच्चे छत्तीसगढ़ में संघर्ष से बचने के लिए आंध्रप्रदेश भाग आए थे। उन्होंने कहा कि इन लोगों को शरण देने के बजाय प्रशासन उनके घरों को नष्ट कर रहा है।
एचआरडब्ल्यू ने कहा है कि पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में नक्सलियों तथा सरकार समर्थित सलवा जुडूम के बीच तनाव बढ़ने के कारण जून 2005 के बाद से 30 से 50 हजार लोग आंध्रप्रदेश के खम्माम और वारंगल जिलों में शरण ले चुके हैं।
संगठन का दावा है कि पिछले वर्ष नवंबर और दिसंबर में की गई जाँच से पता चलता है कि सलवा जुडूम तथा पुलिस द्वारा किए गए हमलों के कारण अधिकतर गाँववासी आंध्रप्रदेश भाग आए हैं।
एचआरडब्ल्यू ने कहा है कि इन बस्तियों को गैरकानूनी बताते हुए प्रशासन बिना किसी पूर्व नोटिस या उचित प्रक्रिया के सैंकड़ों विस्थापित लोगों के गाँवों को बार-बार जला रहा है और वन भूमि से उन्हें जबरन खदेड़ रहा है।
संगठन ने आरोप लगाया है कि कुछ मामलों में तो आंध्रप्रदेश वन विभाग के अधिकारियों ने लोगों को जबरन ट्रक में चढ़ाया और उन्हें छत्तीसगढ़ राज्य की सीमा के करीब छोड़ दिया।
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