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मनी है तो हनी है..!
कहा जाता है कि धन से खुशियाँ नहीं खरीदी जा सकतीं, लेकिन एक नए अध्ययन ने इसके उलट यह साबित कर दिया है कि खुशियों को खरीदा जा सकता है।

फायनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार व्हार्टन बिजनेस स्कूल के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन किया और पाया कि अमीर देशों के निवासी गरीब देशों में रहने वाले लोगों की तुलना में ज्यादा खुश हैं।

अध्ययन वर्षों की उस मान्यता का खंडन करता है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद का आँकड़ा ज्यादा होने से खुशहाली नहीं बढ़ जाती।

शोधकर्ताओं के मुताबिक प्रोफेसर जस्टिन वूल्फर्स और बेटसे स्टीवेनसन द्वारा स्थापित नजरिया जिसे ईस्टरलाइन पेरेडाक्स कहा जाता है, सही नहीं है।

आधी शताब्दी से भी ज्यादा कालखंड और 132 देशों से एकत्रित जानकारी के आधार पर शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि अगर कोई देश अमीर है तो उस देश के लोग खुश होंगे। दूसरे शब्दों में ज्यादा सकल घरेलू उत्पाद होने से मुस्कराहट भी बड़ी होगी।

दैनिक आर्थिक अखबार ने प्रोफेसर वूल्फर्स के हवाले से कहा मेरे विचार से बहुत से लोग राजनीतिक दृष्टि से यह मानने में सहूलियत महसूस करेंगे कि आमदनी सिर्फ गरीबों के लिए मायने रखती है। एक बार हम अपनी मूल जरूरतों को पूरा कर लें तो आमदनी मायने नहीं रखती। अगले सप्ताह होने वाली ब्रूकिंग्स की आर्थिक वार्ता में इस शोध-पत्र पर चर्चा की जाएगी।
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