तिब्बतियों के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा पर अलगाववाद के बीज बोने का आरोप लगाते हुए चीन के बुद्धिजीवियों ने आज तिब्बत के मठों में देशभक्ति की अलख जगाने का संकल्प लिया।
तिब्बत में कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव झांग किंगली के कार्यकाल में इस तरह के शैक्षिक अभियानों में वृद्धि हुई है। चायना तिब्बतालोजी रिसर्च सेंटर में धार्मिक अध्ययन संस्थान के प्रमुख ड्रामदुल ने बताया कि देशभक्ति की शिक्षा का प्रसार जरूरी है क्योंकि दलाई लामा के समर्थक तिब्बत के विकास में तिब्बती बौद्ध धर्म के सामान्य आचरण में बाधा पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि देशभक्ति की शिक्षा का प्रसार दलाई लामा के समर्थकों के घुसपैठ के प्रयास और भिक्षुओं को शिक्षा मुहैया कराने के लिए जरूरी है।
रिसर्च सेंटर के प्रमुख ल्हाग्पा फनत्शोग्स ने दलाई लामा पर आरोप लगाया कि वह अलगाववाद भड़काने के लिए तिब्बत के मठों और बौद्ध भिक्षुओं का सहारा लेते हैं। उन्होंने कहा कि बौद्ध भिक्षुओं को कानूनी शिक्षा दिया जाना जरूरी है क्योंकि धार्मिक गतिविधियाँ कानून के दायरे में ही होनी चाहिए।
बीजिंग ओलिंपिक से पहले ही तिब्बतियो के असंतोष की वजह से चीन सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। कल ही फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने ओलिंपिक खेलों के संभावित बहिष्कार की संभावना से इंकार नहीं किया हालाँकि अमेरिका और ब्रिटेन ने बीजिंग ओलिंपिक के प्रति समर्थन दोहराया है।
तिब्बती बुद्धिजीवियों की टिप्पणियों से जाहिर है कि चीन सरकार तिब्बत में भड़की ताजा हिंसा के बावजूद वहाँ के बारे में 1950 से जारी अपनी नीतियों में बदलाव लाने की इच्छुक नहीं है। सरकार का दावा है कि इस हिंसा में 19 व्यक्ति मारे गए।
दूसरी ओर तिब्बत की निर्वासित सरकार इस हिंसा में मारे जाने वाले लोगों की संख्या 140 बता रही है। तिब्बत डेली में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक गत 14 मार्च के दंगों में चीन के व्यापारियों को निशाना बनाए जाने के बावजूद बुद्धिजीवियों की राय है कि ल्हासा में जातीय संबंध सौहार्दपूर्ण है।
चीन तिब्बत में भड़की हिंसा के लिए दलाई लामा को दोषी ठहरा रहा है जबकि तिब्बती धर्मगुरु ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
|