बार-बार ज्वालामुखी के फटने से डायनासोर लुप्त हो गए। यह कहना है ब्रिटिश वैज्ञानिकों का।
उनके मुताबिक ज्वालामुखी के फटने से निकलने वाली जहरीली गैसों ने डायनासोरों की जान ले ली। विशेष रूप से भारत में दक्खन के पठार में इस तरह की गतिविधियाँ 6 करोड़ 50 लाख साल पहले हुई थीं।
कुछ अन्य वैज्ञानिक ये मानते हैं कि पृथ्वी पर कई उल्कापिंडों के टकराने की वजह से डायनासोर करोड़ों साल पहले लुप्त हुए। पहले की धारणाएँ जो भी रही हों, लेकिन दक्खन के पठार में खुदाई करने में पता चला कि इनमें से जहरीली गैसें निकली होंगी।
साइंस पत्रिका में कहा गया है कि दक्खन में फटे ज्वालामुखी से क्लोरीन और सल्फर दोनों निकले थे। इसका पर्यावरण पर विपरीत असर पड़ा होगा।
ज्वालामुखी का अध्ययन करने वाले स्टीफन सेल्फ ने यह जानकारी दी। उनका कहना है कि ज्वालामुखी जब फटता है तो वह आबोहवा में दस गुना ज्यादा सल्फर छोड़ता है, जिससे सल्फर अम्ल वायुमंडल में बनकर अम्लीय वर्षा करता है। (नईदुनिया)
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