भूटान के इतिहास में पहले संसदीय चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री जिग्मी थिनले के नेतृत्व वाली द्रुक फ्यूएन्सम थोग्पा (डीपीटी) ने भारी जीत दर्ज की। उसे नेशनल असेंबली की 47 सीटों में से 44 सीटें मिलीं।
इन चुनावों को लेकर देश की जनता में बहुत उत्साह था। भूटान नरेश की इस पहल का पूरा देश कायल हो गया।
डीपीटी के कई उम्मीदवार नरेश जिग्मे खेसर नामग्याल के अधीन मंत्री रहे हैं और उन्हें सरकार चलाने का अच्छा अनुभव है।
चुनाव लड़ रही एकमात्र दूसरी पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) को मात्र तीन सीटें मिलीं। पीडीपी का नेतृत्व कर रहे संग्ये नेडुप पुरानी राजशाही में दो बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं।
भारत का सहयोग : मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें भारत से भेजी गईं। भारत के सहयोग से दुनिया में एकदम नए लोकतंत्र का उदय हुआ।
लोकतंत्र का सफर : भूटान में लोकतंत्र लाने की पहल पूर्व नरेश जिग्मे सिंगये वांग्चुक ने की थी। उन्होंने सन् 2001 में दैनिक शासन का काम मंत्रियों की परिषद को सौंप दिया। सन् 2006 में राजगद्दी अपने बेटे खेसर नामग्याल वांग्चुक के लिए खाली कर दी।
नरेश का क्या होगा : इस चुनाव के बावजूद मौजूदा नरेश 28 वर्षीय खेसर नामग्याल वांग्चुक राज्य प्रमुख बने रहेंगे, लेकिन संसद को उन पर महाभियोग चलाने का अधिकार होगा।
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