दक्षिण एशियाई विद्वानों का कहना है कि भारत और अमेरिका को विदेशमंत्री प्रणब मुखर्जी की पहली अमेरिका यात्रा के दौरान असैन्य परमाणु करार पर उत्पन्न हुए गतिरोध को समाप्त करना चाहिए।
वर्जीनिया विश्वविद्यालय के भारतीय विशेषज्ञ हैराल्ड गाउल्ड ने कहा कि अब बातचीत में असैन्य परमाणु करार सबसे महत्वपूर्ण चीज होना चाहिए ताकि वे प्रगति के बारे में खुद को संतुष्ट कर सकें, क्योंकि इस समय करार संतुलन की अवस्था में है।
मुखर्जी रविवार से विदेशमंत्री के तौर पर दो दिन की अपनी पहली अमेरिका यात्रा शुरू करेंगे। इस दौरान वह अमेरिकी विदेशमंत्री कोंडलीजा राइस और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अधिकारियों सहित विभिन्न कैबिनेट और प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात करेंगे।
गाउल्ड ने कहा कि किसी को तो पहल कर सफलता पानी होगी, ताकि परमाणु करार सही रास्ते पर आ जाए। परमाणु करार को मौजूदा स्थिति से हटाना ही पड़ेगा। उन्होंने कहा कि एक तरह से उन्हें इस तथ्य से निपटना होगा कि इस मामले में दोनों तरफ कुछ हद तक गतिरोध है। निश्चित तौर पर कम्युनिस्टों के विरोध के कारण भारत में कांगेस पार्टी बहुत-बहुत नाजुक दौर में है।
अमेरिकी विद्वान ने कहा कि अमेरिका में परमाणु करार को लेकर शिथिलता है, क्योंकि देश में राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार जोर-शोर से चल रहा है।
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