चीन के शासन के दौरान पिछले दो दशक में तिब्बत में बौद्ध भिक्षुओं की अगुवाई में हुए सबसे मुखर विरोध को कुचल देने के लिए कम्युनिस्ट सरकार ने आज जनयुद्ध छेड़ने की घोषणा की। ओलिंपिक के आयोजन से पहले अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहों में आई चीन की सेना दंगाग्रस्त राजधानी ल्हासा पर कड़ी निगरानी रख रही हैं। अधिकारियों द्वारा ल्हासा में हिंसा की किसी नई घटना की जानकारी नहीं दी गई है। गत शुक्रवार को हुए भीषण प्रदर्शन में उग्र भीड़ ने इमारतों और पुलिस एवं निजी वाहनों में आग लगा दी तथा बैंकों और दुकानों में लूटपाट की।
मानवाधिकार समूहों के अनुसार चीन के अन्य भागों में प्रदर्शन जारी हैं। दक्षिण पश्चिमी चीन के सिचुआन प्रांत के तिब्बत बहुल आबादी वाले एक शाहर में झड़पों के दौरान कम से कम तीन तिब्बती प्रदर्शनकारी मारे गए।
अधिकारियों ने बताया कि शुक्रवार की हिंसा में 10 नागरिक मारे जिनमें से अधिकतर झुलसकर मरे। इसके अलावा हिंसा में 12 सुरक्षाकर्मी घायल हो गए।
चीन के दमनात्मक कदम के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय जाँच की माँग करते हुए तिब्बत के शीर्ष आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने चीन पर सांस्कृतिक नरसंहार का आरोप लगाया और दावा किया कि मृतक संख्या 100 तक हो सकती है।
दंगाइयों को सोमवार तक आत्मसमर्पण करने या परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहने की चेतावनी देने वाले तिब्बत के राजनीतिक एवं सुरक्षा प्रमुखों ने दलाई लामा समर्थकों को बेनकाब करने को कहा है।
इन प्रमुखों ने एक आपात बैठक के बाद कहा कि हमें विभाजनवाद को मात देने के लिए जनयुद्ध छेड़ना चाहिए तथा उग्र ताकतों के घृणित कृत्यों को बेनकाब कर उनकी भर्त्सना करनी चाहिए। हमें दलाई लामा समूह के छिपे हुए चेहरे को बेनकाब करना चाहिए।
संवाद समिति शिन्हुवा के मुताबिक दंगाइयों ने 160 जगहों पर असैन्य उपयोग वाली इमारतों को फूँक दिया। तनाव से उबलते शहर में मेयर दोजे सेजुग ने दावा किया ल्हासा शांत है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह अशांति कुछ भिक्षुओं और उपद्रवी लोगों की कारस्तानी है, जिन्होंने मार-पिटाई लूट और आगजनी की। उन्होंने कहा कि सरकार लोगों की स्थिरता बरकरार रखने में कायम हुई है। शिन्हुआ ने ल्हासा में अपने संवाददाताओं के हवाले से कहा कि कई दुकानें खुल गई हैं तथा निजी कारें एवं टैक्सियाँ सड़कों पर दौड़ने लगी हैं।
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